Thursday, March 23, 2017

IPTA, Chandigarh is paying tribute to the martyrs

Chandigarh. Indian People' Theatre Association ( IPTA)-Chandigarh is paying rich tribute to the martyrs of 23rd March, 1931 ( Shaheed-e-Aazam Bhagat Singh, Rajguru & Sukhdev) on 23 March, 2017 at Village Hallo Majra, U.T., Chandigarh at 5.00 PM by presenting a play on the ideology & about last days of the revolutionary martyrs : CHHIPPANN TON PEHLAAN (Before the sun-set) : Written by Shiromani Naatak-kaar Davinder Daman. Directed by : Balkar Sidhu. 

The cast include Jasdeep Singh, Manpreet Singh, Ravneet Kaur, Varun Narang, Sunny Dhillon & Balkar Sidhu. Background Singers : Harpreet Singh Honey & Simranjit Kaur. Music by Lovepreet Singh.

हमसईद, सईद की याद, सईद के सरोकार

प्रस्तुति-शशिभूषण
इंदौर, 19 मार्च, 2017 . दिल्ली से शुरुआत कर भोपाल में पत्रकारिता कर चुके और इन्दौर के पत्रकारिता जगत में बहुत कम समय में ही काफ़ी लोगों का प्यार और इज्जत हासिल कर लेनेवाले, भाषा पर अच्छी पकड़ रखनेवाले, देश दुनिया से लेकर शहर-मोहल्ले की दुरुस्त जानकारी रखनेवाले, पायनियर, डेकन क्रॉनिकल, हिन्दुस्तान टाइम्स आदि में अनेक वर्षों तक जनपक्षधर, हस्तक्षेपकारी पत्रकारिता करनेवाले पत्रकार सईद खान को विगत 13 मार्च को गुज़रे हुए एक साल पूरा हुआ। सईद की स्मृति को ज़िंदा रखने, यादों को ताज़ा रखने, खुशी-खुशी याद करने के लिए 19 मार्च 2017 को इन्दौर के प्रेस क्लब में ‘सईद की याद...सईद के सरोकार..: हमसईद’ कार्यक्रम आयोजित हुआ। इस कार्यक्रम का उद्देश्य कोरी श्रद्धान्जलि के स्थान पर सईद को ऐसे याद करना था कि उन सरोकारों को अपने भीतर फिर से जीवित महसूस करना जिन्होंने सईद को ईमानदार, विश्वसनीय एवं सबका चहेता बनाया। दुखद है कि आम लोगों के जीवन को केंद्र में रखकर पत्रकारिता करने वाले सईद का 46-47 वर्ष की आयु में पिछले वर्ष कैंसर से जूझते हुए असमय निधन हुआ। जब सईद लिवर कैंसर से जीवन की लड़ाई लड़ रहे थे तब उनके चाहने वालों और दोस्तों ने ‘हमसईद’ सहायता समूह बनाया था।

सईद खान का परिचय देते हुए इन्दौर प्रेस क्लब के महासचिव नवनीत शुक्ला ने कहा- सईद, दोस्त, साथी पत्रकार ही नहीं हमारे लिए सलाहकार जैसे भी थे। हर हाल में किसी भी अवसर पर उनकी सलाहे हमें उबारती थीं, आगे बढने का हौसला देतीं थीं औऱ समृद्ध करतीं थीं। हमने तय किया है कि उनकी स्मृति में इंदौर प्रेस क्लब की ओर से हर वर्ष खोजी पत्रकारिता के लिए एक सम्मान दिया जाएगा। यह सम्मान प्रतिवर्ष प्रेस क्लब के वार्षिक समारोह में 9 अप्रैल को दिया जायेगा। पुरस्कार की राशि 11 हज़ार रुपये होगी।

सईद के भाई एवं पायनियर के पत्रकार रहे अकबर खान ने कहा- मैं इस दिन के लिए तैयार नहीं था। आप एक उम्र में आकर अपने बुज़ुर्गों के न रहने के लिए तैयार हो जाते हैं लेकिन सईद ऐसे बेवक़्त चला जाएगा, ये मैंने कभी नहीं सोचा था और आज तक भी  इस पर यक़ीन कर पाना मुश्किल होता है। कभी खयाल भी नहीं आया कि उसकी याद में ऐसे बोलने का दिन आयेगा। सईद और मैं भाई, दोस्त और जोड़ीदार थे। हमारे वालिद भी लेखक थे। मुम्बई में हमारे घर में उस वक़्त देश के सबसे बड़े पत्रकारों का आना जाना लगा रहता था।  बचपन से ही हम दोनों को शायद वहीं से पत्रकारिता के प्रति दिलचस्पी पैदा हुई होगी। खूब पढ़ने की हम लोगों को लत थी। सईद को हमारे वालिद से सीख मिली कि हमें आम भाषा में लिखना है, अपनी अंग्रेज़ी का प्रदर्शन करने के लिए नहीं। सईद पैदल खूब चलता था। वह सड़क से जुड़ा था। पैदल चलने के कारण सड़क के लोगों से उसका वास्ता था। वह उनके सरोकारों के बहुत करीब था। उसने तरक्की के बारे में कभी नहीं सोचा।लोग दिल्ली जाते हैं वह दिल्ली, भोपाल छोड़कर इन्दौर आ गया। उसके भीतर सरोकार इस तरह समा गये थे कि सरोकार ही सईद थे। उसके सरोकार में बच्चे, सड़क के लोग, पेड़, पानी ही थे। वह खुद को सड़क गड्ढों का, पेड़ पानी का पत्रकार कहता था। थोडे समय में ही इन्दौर और सईद एक ही हो गये थे। सईद अब हमारा ही नहीं रहा। वह आप सबका हो गया।

आदिवासी हकों, शिक्षा और पर्यावरण के मसलों पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता राहुल बनर्जी ने सईद के साथ अपने संस्मरणों के बीच में कहा- सईद खबरों की बाईलाईन में अपना नाम नहीं देता था। लेकिन पढ़कर सईद का लिखा हमेशा पहचान में आ जाता था। सईद प्रेरणाओं से भरा हुआ था। उसका व्यक्तित्व चाय के प्याले की अंतिम बूँद पीनेवाले व्यक्ति का था।  वो शहर के भीतर के ही नहीं बल्कि आसपास के ग्रामीण इलाकों में भी काम कर रहे लोगों को ढूंढता और उनके काम के महत्त्व को रेखांकित कर उन्हें नयी ऊर्जा और गौरव का भाव देता था। उन्होंने धार का एक किस्सा सुनाया कि किस तरह टवलाई में जहां हम आराम के लिए रुके, सईद ने वहां से नर्मदा बचाओ आंदोलन के उद्गम की कहानी निकाल ली और वो स्टोरी हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित हुई। 
दिल्ली से आये विभिन्न अखबारों एवं बीबीसी के लिए लिख रहे सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार-संपादक संजीव माथुर ने कहा- हम  अपने आपको इंदौर स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म के विद्यार्थी कहते थे क्योंकि यहां राजेन्द्र माथुर जैसे अद्भुत पत्रकार हुए हैं। । हम कुछ पत्रकार साथियों ने इंदौर में स्टडी सर्कल एवं चर्चा-परिचर्चा का सिलसिला शुरू किया था जिसमे सईद भी हमेशा आते थे। हमने सईद में न केवल देखा बल्कि उनसे सीखा कि पत्रकारिता में प्रोफेशनली अपग्रेड रहते हुए कभी झुकना नहीं है। साथ ही हमारी विचारधारा का प्रभाव हमारी रिपोर्टिंग पर नहीं होना चाहिए। सईद जानते थे कि दमन के बीच टिके रहना बिना सरोकार और वैचारिकता के नहीं हो सकता। आज पत्रकारिता में संपादकीय मूल्य छीज रहे हैं, रिपोर्टिंग खत्म की जा रही है, डेस्क हावी हो रहा है ऐसे समय में भी सईद से ही यह मिसाल बनती है कि मेहनत और ईमानदारी के साथ ही रस्ते निकलते हैं।

'हमसईद' कार्यक्रम में यादों के गंभीर, वैचारिक सिलसिले में मार्मिक पड़ाव तब आया जब इंदौर के पूर्व नगर निगम आयुक्त और ज़िले के वर्तमान कलेक्टर नरहरि सभा में अचानक ही पहुंचे।  उन्हें जब सईद की याद में बोलने के लिए कहा गया तो उन्होंने कहा- सईद से मेरा दोस्ताना था। हम हमेशा संवाद में रहे। कभी सईद याद कर लेते तो कभी मैं। मैं 2004-05 में इंदौर से गया तो सईद यहीं रहे। मैं जब दुबारा कलेक्टर बनकर आ रहा था तो उम्मीद थी कि सईद से फिर संवाद रहेगा। मुझे बहुत दुख हुआ जब पता चला कि सईद लिवर कैंसर के इलाज के लये दिल्ली हैं। नरहरि जी ने कहा कि अपने सोलह साल के करियर में यह पहला कार्यक्रम है जिसमें मैं बिना बुलाये आया हूँ। मुझे समाचारों से पता चला तो मैं यहाँ आने से खुद को रोक नहीं पाया। सईद जैसे पत्रकार निस्वार्थ पत्रकार होते हैं। हमें ऐसे कार्यक्रम तो करने ही चाहिए साथ ही यह भी होना चाहिए कि जब ऐसे लोग जीवित हों तो उनको साथ और सच्चे सहयोग मिले।

नईदुनिया, इंदौर में उपसंपादक और सईद के करीबी रहे पत्रकार अभय नेमा ने अनेक किस्से याद करते हुए कहा- सईद ने जान बूझकर गाड़ी नहीं ली थी। वे चाहते तो गाड़ी गिफ्ट में ही मिल जाती लेकिन उन्होने अपनी ईमानदारी से कभी समझौता नहीं किया। निर्भीक पत्रकारिता की, कमज़ोर लोगों का हमेशा खयाल रखा। वे हमेशा घूमते रहते थे, लोगों से बातचीत कर करके खबरें निकालते थे। जब ट्रेजर आईलैंड बन रहा था तो सईद एक दिन ऊपरे माले पर पहुँच गये। यों ही बात चीत शुरू कर दी और तब उन्हें पता लगा यह माला अवैध है। इसके बाद उन्होंने कई स्टोरी कीं और बिल्कुल नहीं झुके न ही कोई प्रलोभन स्वीकार किया। सईद अपनी ऐसी सफलताओं की कभी डींग नहीं हाँकते थे। वे किसी को डरा देने, दवाब में ले लेने के किस्से सुनानेवाले पत्रकार नहीं थे। उनकी कमी ने आज इंदौर की पत्रकारिता में बड़ी कमी उपस्थित कर दी है। देश भर में पत्रकारिता अब सेल्फी जर्नलिज्म और संबंधाश्रित होती जा रही है, ऐसे में सईद जैसे लोग पत्रकार साथियों के लिए भी आइना दिखाते थे।

इंदौर में कई वर्षों से रह रहे व्यापारी और सईद के अभिन्न मित्र फ़िलिस्तीनी मूल के आमिर खान ने कहा - वह बहुत अच्छा दोस्त था। उससे मेरी दोस्ती फुटपाथ पर हुई थी। वह इंदौर को इंदौर के लोगों से बेहतर ही नहीं जानता था बल्कि फिलिस्तीन को भी मुझसे बेहतर जानता था। मैं समझता हूँ वह पत्रकारिता में और जीवन में बड़ा रिसर्च करनेवाली शख्सियत थी।

अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता जया मेहता ने कहा कि मुझे सईद का काम, उनके लिखने की शैली पसंद थी। मैं चाहती थी कि सईद मेरे साथ काम करे। मैं तो अपनी मार्क्सवादी पहचान हमेशा ज़ाहिर करती हूँ तो वे कहते कि मैं तो मार्क्सवादी नहीं हूँ तो फिर कैसे काम होगा। सईद मुझसे कहते थे मैं राजनीतिक नहीं हूँ लेकिन उनके इंकार के बावजूद मैं उनके काम में अपनी पॉलिटिक्स का रिफ्लैक्शन देखती थी। वे अपने काम से मेरी राजनीति के काफी नज़दीक थे। सईद को अपने काम में छोटी-छोटी चीज़ों को अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य के साथ रखने में महारथ हासिल थी। सईद का महिलाओं के संघर्ष के प्रति बहुत रूचि और सम्मान था। वे हर महिला दिवस पर महिला फेडरेशन की महासचिव सारिका को फोन करके बधाई देते थे और हमसे कुछ न कुछ जानने की इच्छा रखते थे कि पिछले वर्ष भर में कामकाजी महिलाओं के क्या संघर्ष हुए और आगे क्या योजनाएं हैं। शाहबानो के केस में सईद ने बड़ी मार्मिकता और प्रतिबद्धता के साथ लिखा। उसे ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। हम सईद को इसलिए याद कर रहे हैं क्योंकि जब व्यक्ति चला जाता है तो उसकी यादें भी हमें ज़िदा रखती हैं। आज मेनस्ट्रीम मीडिया में अल्टरनेटिव जर्नलिज्म को जगह नहीं है लेकिन हमें ब्रेख्त की बात याद रखनी चाहिए जो वे ड्रामा के विषय में कहते हैं। ब्रेख्त ने कहा है ड्रामा केवल एक्टर से नहीं बनता। बल्कि ड्रामा पूरा होता है अपने एक्टर और आडिएंस से। यही बात पत्रकारिता पर भी लागू होती है। मैं अभी सोशल मीडिया की समस्या पर बात नहीं करूँगी केवल इतना कहूँगी कि रीडरशिप का अधिकार भी पत्रकारिता को सुधार सकता है। रीडरशिप का अधिकार बहुत महत्वपूर्ण होता है। 

प्रेस क्लब के सभागार में सईद की अनेक तस्वीरें लगी थीं। एक तस्वीर में सईद की उँगलियों में फंस हुआ सिगार भी है। उस ओर इशारा करके जया ने सईद की जिंदादिली से जुड़ा एक संस्मरण भी सुनाया। उन्होंने बताया- मैं जब पहली बार २० साल पहले क्यूबा गयी थी तो सिगार का एक डिब्बा लेकर आई थी। घर में कोई स्मोकर न होने से वो पड़ा रहा और सालों बाद फिर एक दिन सामान इधर-उधर करने, सहेजने के दौरान वह डिब्बा मिल गया। बीस साल बाद क्यूबाई सिगार का वह डिब्बा अचानक मिला तो हम सब दोस्तों ने उसे उत्सव की तरह मनाने को सोचा। दफ्तर से छूटकर रात में करीब 12 - 1 बजे सईद भी मेरे घर आ गए। सिगार पुराने हो जाने से सूख गए थे और जल नहीं पा रहे थे तो सबने सोचा कि कम से कम थोड़ी देर के लिए अपने आपको फिदेल कास्त्रो और चे गुवेरा समझ जाए। सबने बारी-बारी से सिगार को मुंह में लगाया। सब खुद को फिदेल और चेग्वेरा समझते रहे और खुश होते रहे। तब सईद ने उसे वैसे ही मुंह में लगाकर सारिका से तस्वीरें खिंचाई जो यहाँ अभी लगी हैं। 

कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी ने सईद को बड़ी शिद्दत से याद करते हुए कहा- सईद के यों तो अनगिन किस्से हैं। सईद का व्यक्तित्व बड़ा उबड़ खाबड़ लेकिन हरफनमौला था। वह क्रांतिकारिता, ईमानदारी को अलग नहीं मानता था बल्कि इंसानियत में ही क्रांतिकारिता को देखता था। वह जो भी कहता था विनम्रता, ईमानदारी और सरोकार के साथ कहता था। सईद को याद करने का मतलब है खुद को बेहतर इंसान बनाना, सरोकारों के प्रति पूरी मेहनत से समर्पित रहना। मैं आज खुद को बेहतर इन्सान महसूस कर रहा हूँ। वह अपनी पत्रकारिता को सड़क के गड्ढे से खेती तक लेकर आया। वो हम लोगों से खेती के बारे में जानना समझना चाहता था की किस तरह गाँवों में आजीविका का भीषण संकट फैला हुआ है और उसका सही सही कारण क्या है। 

हम सईद को आज इस तरह उसके अपनों, उसके काम के साथ याद करते हुए कपङे साथ उसे ज़िंदा महसूस कर रहे हैं। कह सकते हैं सईद अगर ज़िंदा होता तो उसके जैसे और लोग हमारे साथ आते, सामूहिकता और सांगठनिकता से बेहतर पत्रकारिता की अनेक मिसालें बनतीं और नए पत्रकारों के लिए  प्रेरणा बनती। हमसईद के ज़रिये हम यही करने की कोशिश करेंगे और इस तरह सईद को अपने साथ ज़िंदा रखेंगे। उन्होंने कलेक्टर महोदय को भी कहा कि अब आप भी अपने आपको हमसईद का हिस्सा समझें।

सईद बहुत स्वाभिमानी था और वो किसी भी तरह किसी लालच या दबाव में नहीं आता। था  ऐसा जीवन जीने से आप में एक गौरव भाव आता है। सईद कैंसर से भी घबराया नहीं और आखिर  वो गया भी तो अपने सम्मान के साथ। सईद शादीशुदा नहीं थे। सईद ने स्वयं विवाह नहीं किया था। अकबर का परिवार और उसके दोस्त ही उसका परिवार था। उसकी जान उनकी अपनी भतीजियों महक, निदा और ज़ोया में बसती थी।  बच्चियां सईद को सईदसईद कहती थीं और बदले में सईद भी उनका दो बार नाम  लेते थे। अपने प्यारे सईद सईद के बारे में सुनकर और उनकी तस्वीरें देखकर बार बार उनकी आँखों में आँसू छलक आ रहे थे। लेकिन सईदसईद को तस्वीरों में मुस्कुराता देखकर वो अपने आँसू पोंछ लेती थीं और मुस्कुराने लगतीं थीं।


जया मेहता ने एक दिन पहले ही दिवंगत हुईं भारती जोशी को भी याद किया। उन्होंने कहा भारती जी बहुत अच्छी शिक्षिका थीं। वे बहुत अच्छा पढ़ाती थीं और बोलती थीं। भारती जी की आवाज़ बहुत अच्छी थी। उन्होंने बहुत अच्छे नाटक भी बनाये थे। सभा में उपस्थित लोगों ने दो मिनट का मौन रखकर उनके प्रति भी अपनी श्रद्धांजलि और प्रेम प्रकट किया।

इस अवसर पर बड़ी संख्या में पत्रकार, साहित्यकार, स्वजन एवं अलग अलग क्षेत्रों की शख्सियतें उपस्थित रहीं। उपस्थित लोगों में प्रमुख रूप से भोपाल से आईं सईद की भाभी फौज़िया, प्रेस क्लब इंदौर के अध्यक्ष अरविन्द तिवारी, पूर्व अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल, अजय लागू, सुलभा  लागू, सारिका श्रीवास्तव, रुद्रपाल यादव, प्रमोद बागड़ी, संजय वर्मा, कैलाश गोठानिया, कल्पना मेहता, कविता जड़िया, अनुराधा तिवारी, हसन भाई, जावेद आलम आदि उपस्थित थे। प्रलेसं, इप्टा, सन्दर्भ, रूपांकन, इन्दौर प्रेस क्लब एवं मेहनतकश के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुए इस कार्यक्रम में रूपांकन इंदौर की  ओर से अशोक दुबे द्वारा पत्रकारिता पर केंद्रित पोस्टर प्रदर्शनी भी लगायी गयी। इस कार्यक्रम का संचालन विनीत तिवारी ने किया।

Tuesday, March 21, 2017

IPTA national committee condemns the attack on professor Chauthi Ram Yadav

IPTA national committee condemns the attack on professor Chauthi Ram Yadav at Bareilly college at Bareilly and registration of fake case against him.Rakesh GenerYal,Secretary of IPTA said that this attack is in continuation of attacks on freedom of expression and on autonomous institutions.He has called upon all IPTA units to resist such forces with democratic means and has expressed his solidarity with Prof.Chauthi Ram Yadav.

Rakesh,General Secretary

Friday, March 17, 2017

बिस्मिल्ला खान संगीत की दुनिया में कबीर की परंपरा को निभा रहे थे

-अग्निशेखर
हान शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खान की गायन शैली की केंद्रीय संम्वेदना को अपनी बारीकियों और जटिलताओं के साथ सुपरिचित चित्रकार वीरजी सुम्बली की पेंटिंग देखकर आज एक साथ कई बातें याद हो आईं।

उस्ताद बिस्मिल्ला खान देहावसान से कुछ समय पूर्व जम्मू आए थे ।यहाँ जम्मू -कश्मीर की कला,संस्कृति और भाषा अकादेमी के ' अभिनव थियेटर ' में जम्मू विश्वविद्यालय, अकादमी और स्पिक-मैके (Spic-Macay) का संयुक्त आयोजन था।इसके बाद उस्ताद बिस्मिल्ला खान जी का श्रीनगर में भी शहनाई वादन हुआ था ।

उनके शहनाई वादन की एक अविस्मरणीय शाम उनके प्रशंसकों के लिए जीवन - उपलब्धि से कम नहीं ।

क्या अद्भुत् शहनाई वादन था उस्ताद बिस्मिल्ला खान का उस दिन!मुझे गंगा घाट पर बजाई उनकी शहनाई की बार बार याद आती रही।

तब मैं उनके निवास पर उनके दर्शन करने गया था और मुझे किसी ने बताया कि उनका गंगा घाट पर कार्यक्रम था । फिर भी उनके घर की एक झलक देख लौटते हुए लगा कि तीर्थ यात्रा की है और उस पुण्य का फल सीधे गंगा घाट पर मिला।उन्हें सुनकर।

ठीक उसी तरह जम्मू में उनके शहनाई वादन को सुनने के दौरान मिले भावातीत आनंद की वो अनुभूतिीं भी दिलों दिमाग पर छपी सी है ।

उनकी शहनाई के दीवानों से भरे 'अभिनव थिएटर' के सभागार में मंच पर उनकी गरिमामय उपस्थिति का आतंक और हर्ष आह्लादकारी तो था ही , उनकी शहनाई से निःसृत अठखेली करती राग-रागिनियों की हवा में उठती अदीख अगरबत्ती की सर्पिल रेखाएँ किसी समाधि -सुख से कम न थीं ।

मैंने कालेज के दिनों से ही उनके कैसेट्स खरीदना,उधार मांगकर सुनना शुरू किया था। भरपूर सुना है उनको।कभी तृषा बुझी नहीं ।

1990 में मातृभूमि से मिली जलावतनी से पूर्व मैंने उस्ताद बिस्मिल्ला खान के शहनाई वादन को सुनकर एक बार घुप्प रात में खिड़की से आँगन पार के चिनार की फुनगी पर कार्तिक की पूनम के खिले चाँद को देखा ।

कुछ देर मंत्रमुग्ध रहने के बाद मैंने एक निर्वैयक्तिक क्षण में "उस्ताद बिस्मिल्ला खान को सुनते हुए " शीर्षक से दो कविताएँ लिखीं थीं ।

दूसरे दिन रेडियो कश्मीर, श्रीनगर जाकर प्रसिद्ध संतूर वादक और संगीतकार पं.भजन सोपोरी और कवि मोहन निराश को ये दोनों कविताएँ सुनाई थीं ।

कविताएँ सराहने के बाद मुझे याद है कि दोनों अधिकारी विद्वानों ने उस्ताद बिस्मिल्ला खान के वादन पर बात बात में कितनी महत्त्वपूर्ण चर्चा की थी। तब मुझे भी उनकी कई बारीकियों का ज्ञान हुआ था।

जम्मू के उस ऐतिहासिक कंसर्ट से पूर्व उस्ताद बिस्मिल्ला खान जी के चेहरे पर हाॅल में बिजली गुल हो जाने और बारबार साउंड-सिस्टम खराब होते रहने से खीझ और अवसाद के भाव देखकर हमें ग्लानि और खेद हो रहा था। बजाने से पूर्व कलाकार का मूड उखड़ जाने की आहट चिंताजनक थी।

उस समय मंच-संचालक ने समारोह के मुख्य अतिथि राज्य सरकार के एक मंत्री तथा जम्मू विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो.अमिताभ मट्टू दोनों को उस्ताद बिस्मिल्ला खान और उनके सहवादक कलाकारों के सम्मान के लिए मंच पर आमंत्रित किया था । दोनों अतिथि कलाकार के सामने पहुँचे ही थे कि सभागार का साउंड सिस्टम एक बार घनघोर शोर करता हुआ खामोश हो गया।

सभी लोग स्तब्ध हुए और छूटते ही शहनाई के कोमल सुरों के चक्रवर्ती सम्राट की अकस्मात् दहाड से कुलपति और मंत्री घबरा कर दो कदण पीछे को हट गये।उस्ताद बिस्मिल्ला खान के इस अप्रत्याशित रौद्र से सहम गये कुलपति महोदय के चेहरे पर हवाइयां उड़ गयी थीं।

उस्ताद बिस्मिल्ला खान हवा में हाथ हिलाते हुए जोर से झल्लाये थे-"अररे ! लआनत है तुम पर ! यह क्या माजरा है! "

उनसे डरे और शर्मिन्दा स्वर में क्षमा याचना की गयी ।साउंड सिस्टम हाथ के हाथ ठीक किया गया ।उनका सम्मान किया गया ।उनका मन चूँकि उखड़ गया था ।इसलिए किसीको उनसे बेहतर प्रस्तुति की आशा न रही ।

लेकिन वह नैसर्गिक कलाकार थे और थे आशुतोष ।पल में तोला पल में माशा। कुछ ही पल में हमें अपने साथ बहा ले गये थे अबूझ आनंदालोक में ।

और जब एक दिन उनके देहावसान की खबर आई तो संसार सकते में आ गया था ।मैं अपने कमरे में एक कोने से दूसरे कोने तक टहलता रहा।देर तक।

मैंने दुखी मन से कवि केदारनाथ सिंह को फोन लगाया । वह भी उनकी मृत्यु से सदमे में थे।
हमने देर तक अपना दुख साझा किया ।कई संस्मरण उन्होंने सुनाए मुझे ।

मैंने केदार जी से कहा, " बिस्मिल्ला खान जी संगीत की दुनिया में कबीर की परंपरा को निभा रहे थे।"

केदार जी ने हामी भरी थी ।
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गोली-लाठी चला लो लेकिन विचार को नहीं मार पाओगे

प्रस्तुति- शशिभूषण
12 मार्च 2017 को इंदौर स्थित देवी अहिल्या केंद्रीय पुस्तकालय के अध्ययन कक्ष में प्रगतिशील लेखक संघ, इंदौर इकाई द्वारा एक बैठक आयोजित की गई।
इस बैठक में प्रलेसं के प्रांतीय महासचिव, कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी ने हाल ही में मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के 11 सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल के साथ शहीद लेखकों डॉ नरेंद्र दाभोलकर, कॉ गोविन्द पानसरे और एम एम कलबुर्गी के गृह नगरों क्रमशः सतारा, कोल्हापुर और धारवाड़ की अपनी यात्रा के संस्मरण सुनाए। इस यात्रा का उद्देश्य लेखकों की शहादत के प्रति अपना सम्मान प्रकट करना, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता ज़ाहिर करना एवं शहीद लेखकों के परिजनों के प्रति एकजुटता जताना तथा इस संकल्प का प्रसार करना था कि तर्कशीलता और विचारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी का संघर्ष जारी रहेगा।
लेखकों के प्रतिनिधिमंडल में मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष और 'प्रगतिशील वसुधा' पत्रिका के संपादक श्री राजेन्द्र शर्मा (कवि) तथा महासचिव श्री विनीत तिवारी (कवि-नाटककार और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता) के साथ अध्यक्ष मंडल के सदस्य सर्व श्री हरिओम राजोरिया (कवि-नाटककार), प्रान्तीय सचिव मंडल सदस्य और वरिष्ठ कवि श्री बाबूलाल दाहिया, श्री शिवशंकर मिश्र 'सरस', तरुण गुहा नियोगी, सुश्री सुसंस्कृति परिहार, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार श्री हरनाम सिंह, कहानीकार श्री दिनेश भट्ट, नाट्य निर्देशिका और अभिनेत्री सुश्री सीमा राजोरिया, तथा 'समय के साखी' पत्रिका की संपादक और कवयित्री सुश्री आरती शामिल थे। ये लेखक प्रदेश के भोपाल, इंदौर, अशोकनगर, मंदसौर,सतना,सीधी, जबलपुर, छिंदवाड़ा और दमोह शहरों से आते हैं।
विनीत तिवारी ने अपने वक्तव्य में महाराष्ट्र, कर्नाटक और गोआ के अनुभवों को विस्तार से साझा किया। शहीद लेखकों के परिजनों से भेंट, फ़िल्म संस्थान के अनुभव एवं गोवा के संस्मरण तथा प्रेस कॉन्फ्रेंस आदि के अनुभव बांटे।
विनीत तिवारी ने बताया- आज सबसे अधिक ख़तरा और पहला हमला विचारकों, शिक्षकों एवं लेखकों पर ही है। एक समय था जब बुद्धिजीवियों का लिहाज़ होता था और बुरी से बुरी परिस्थिति में भी शिक्षकों, लेखकों पर हमला नहीं होता था। लेकिन आज हालात बिलकुल उलटे हैं। विगत वर्षों में मारे गए तीनों शहीद लेखक सत्तर और 80 वर्ष की आयु के वरिष्ठ विचारक ही थे। उनके सिरों में ही गोली मारकर यह स्पष्ट संकेत दिया गया कि हत्यारे, विचारों के ही हंता हैं। चरमपंथियों के निशाने पर प्रगतिशील विचार ही हैं।
विनीत तिवारी ने पुणे फ़िल्म संस्थान के और पुणे प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा साधना मीडिया सेंटर में हुई पुणे के प्रखर बौद्धिक विचारवंतों के साथ हुई सभा के संस्मरण भी सुनाए। उसके अतीत एवं गौरव पूर्ण उपलब्धियों से परिचय कराया। प्रख्यात संगीतज्ञ विदुर महाजन, अपर्णा महाजन, मैत्रबन, क्रांति कानाडे, ईशा, शांता रानाडे, राधिका इंग्ले, रूचि भल्ला, लता भिसे, माओ, मिलिंद, एस. पी. शुक्ला, अमित नारकर, दीपक मस्के, लतिका जाधव, नीरज, जहाँआरा, अहमद, नाची मुत्थु, राकेश शुक्ल, आदि से मुलाक़ात के किस्से सुनाए। फ़िल्म निर्माण तकनीकि में काम आनेवाली पुरानी सामग्री के चित्र और पूरी यात्रा के दौरान के अनेक चित्र दिखाये।
विनीत ने बताया कि पुणे से सबसे पहले हम लोग डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की पत्नी डॉ. शैला दाभोलकर और बेटे डॉ. हमीद दाभोलकर से मिलने सतारा पहुंचे। वहां अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के काम और अभियान को जाना। आत्मीय बातचीत में डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की पत्नी का अनुभव सुनना संकल्प से भर गया। उन्होंने कहा- मुझे लगता ही नहीं कि नरेंद्र अब नहीं हैं। मैं कुछ भी करने जाऊं तो मन में उन्हीं से पूछ लेती हूँ। उन्होंने बताया कि दशकों तक संघर्ष के बाद आखिर महाराष्ट्र सरकार को ओझा, टोने-टोटके करने वालों के खिलाफ कानून बनाना ही पड़ा। डॉ. दाभोलकर की मृत्यु को 4 वर्ष होने वाले हैं। आंदोलन बढ़ रहा है लेकिन सरकारें धीमे-धीमे काम कर रही हैं। नहीं भूलना चाहिए तीनों शहीद लेखकों के हत्यारे अब तक पकड़े नहीं गए हैं।
विनीत तिवारी ने साहित्य अकादमी सम्मान लौटाने वाले लेखक और एम एम कलबुर्गी के लिए धारवाड़ में न्याय की लड़ाई लड़ रहे लेखक पद्मश्री गणेश देवी के प्रयासों और दक्षिणायन संगठन के बारे में बताया। गणेश देवी अब गुजरात से धारवाड़ आकर रहने लगे हैं और कन्नड़ के लेखकों और अकादमिक विद्वानों को कलबुर्गी के लिए न्याय की मांग के लिए निर्भय होकर लामबंद कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि कलबुर्गी विशुद्ध लेखक थे। उन्होंने 120 से ज़्यादा दर्शन और इतिहास विषयक ग्रन्थ लिखे थे। उनके साथ उनके लिए लड़ी जा रही लड़ाई में यदि लेखक शामिल न हुए तो कौन शामिल होगा? कलबुर्गी ने अकेले इतना वैचारिक लेखन किया है जितना कर्नाटक में शताब्दियों में नहीं लिखा गया है। कलबुर्गी का कमरा अब पूरी तरह उनकी तस्वीर एवं पुस्तकों के साथ एक लेखक के स्मृति कक्ष के रूप में उपस्थित है। धारवाड़ में प्रतिनिधिमंडल ने प्रो. कलबुर्गी के परिजनों, उनकी पत्नी उमादेवी, प्रो. गणेश देवी, प्रो. सुलेखा देवी, विख्यात सामाजिक आंदोलनकारी एस.आर. हीरेमठ और कर्नाटक के विभिन्न हिस्सों से आये 40 कन्नड़ लेखकों से मुलाक़ात की।
कोल्हापुर में गोविन्द पानसरे ने बड़ी संख्या में अलग-अलग संगठन बनाये। उन्होंने जब किसी की तक़लीफ़ जानी तो उस तरह की तक़लीफ़ में पड़े अन्य लोगों को भी खोजा और उन्हें संगठित किया। पानसरे ने अपने संगठन के लोगों के सामने लक्ष्य रखा कि आप लोग उन सामाजिक कार्यकर्ताओं को ढूंढकर उनकी जीवनी परक कम से कम 80 किताबें छापें जो बिना प्रसिद्ध हुए ख़ामोशी से काम करते रहते हैं। यह काम हुआ और कॉमरेड पानसरे ने स्वयं शिवाजी सहित बहुत से विषयों पर आँख खोल देनेवाली, सरकारों को असुविधा पैदा करनेवाली किताबें लिखीं।
विनीत तिवारी ने कोल्हापुर में पानसरे की याद में प्रातः होनेवाली निर्भय यात्रा का भी हाल सुनाया कि किस तरह हम लगभग 200 लोग सुबह इस ऐलान के साथ टहलने निकले कि हम डरे हुए नहीं हैं। हमारी लड़ाई जारी है। हम बच-बचाकर नहीं, बल्कि पूरे मन से और समर्पण के साथ एकजुटता में संलग्न है और किसी भी खतरे के लिए तैयार हैं। लोग गीत गाते चले कि"गोल्या लठ्या घाला, विचार नहीं मरणार" (गोली लाठी चला लो लेकिन विचार को नहीं मार पाओगे।)। कोल्हापुर में पानसरे जी का प्रभाव हज़ारों लोगों पर है और वहां उनकी पत्नी उमा पानसरे, बहू मेघा पानसरे, पोते मल्हार और कबीर के साथ ही उनके चाहने वाले हज़ारों लोगों से बहुत ही आत्मीय अभिनन्दन हमें प्राप्त हुआ।
उन्होंने बताया कि गोवा की यात्रा कई मायने में अविस्मरणीय एवं दूरगामी प्रभाव डालनेवाली रही। गोवा में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पत्रकारों लेखकों की उपस्थिति उनके सवालों एवं सहयोग आदि ने आश्वस्त किया।
इसी बीच सरकार द्वारा कोल्हापुर में दिए एक नोटिस का ज़िक्र भी आया जिसमें कहा गया था कि आप लोग मीटिंग में किसी का भी नाम नहीं लेंगे और किसी की निंदा नहीं करेंगे वर्ना आप लोगों को गिरफ्तार कर लिया जायेगा। तब पत्रकार निखिल वागले ने अपने वक्तव्य की शुरुआत ही यह कहकर की कि जिन्होंने हत्या की आप उन्हें पकड़ नहीं रहे उलटे आप हमें ही कह रहे हैं कि हम उनकी आलोचना न करें उनके ख़िलाफ़ आवाज़ न उठाएं। यह ठीक नहीं। हम संघर्ष नहीं छोड़ सकते। आप लोग हमें डराने की बजाय अपना काम कीजिये। इसके बाद देखा यह गया कि जो पुलिसकर्मी, अधिकारी ग़ुस्से में थे इत्मीनान से बैठ गए और ध्यान से सुनने लगे।
कुलमिलाकर विनीत ने इस बात से अपने वक्तव्य का उपसंहार किया कि आज हर स्वतंत्र सोचने विचारने वाले व्यक्ति के लिए एकजुटता, संलग्नता और संघर्ष ज़रूरी हैं। इस यात्रा के संस्मरणों के प्रकाशन को जल्द ही परिणति दी जायेगी एवं फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ निडर लेखन करनेवाले इन तीनों लेखकों की विचार पुस्तकों को हिंदी में भी अधिकाधिक पाठकों तक पहुंचाया जाएगा। ध्यान रहे, लेखकों के लिए देशाटन आवश्यक इसीलिए बताया गया है ताकि लेखक के अनुभव का दायरा बढ़े। हमने इस यात्रा को सोद्देश्य बनाया और अन्य भाषा-भाषी समाज से सीखा-जाना, उनसे जुड़े, उन्हें जोड़ा और जहाँ ज़रूरत हो वहां खड़े होने की निडरता लेकर लौटे। इस यात्रा के दौरान प्रत्येक दिन हमारे सत्तर साला साथियों ने भी युवाओं के उत्साह और सक्रियता का परिचय दिया। हमने इस यात्रा में बहसें की, योजनाएं बनायीं, वास्तविक अमल की रुपरेखा तैयार की और सभी साथियों को यह भी काफी ऊर्जा देने वाला और एक दूसरे को समृद्ध करने वाला अनुभव लगा। हमारे समूह में तीन महिला साथी भी थीं। उनकी सक्रिय भागीदारी पूरी यात्रा में रही।
बैठक के अंत में विनीत तिवारी ने हाल ही में गिरफ़्तार किये गए पत्रकार - संपादक दीपक 'असीम' के मामले से लोगों को अवगत करवाया कि किस तरह ओशो के एक लेख के पुनर्मुद्रण पर उनके खिलाफ कार्रवाई की गयी। ये समाज में विरोधी विचार के प्रति कम होती सहनशीलता की प्रवृत्ति को दर्शाता है। इसके लिए हमें निर्भय होकर जनता से अपने विचार साझा करने होंगे और तर्कशील स्वस्थ बहस का वातावरण बनाना होगा।
बैठक में अन्य लोगों ने भी विचार व्यक्त किये। उपस्थित लोगों में ब्रजेश कानूनगो, अभय नेमा, सुलभा लागू, डॉ. कामना शर्मा, शशिभूषण, तौफ़ीक़, प्रशांत, रामासरे पाण्डे, अजय लागू, आदि प्रमुख थे।

Friday, March 3, 2017

“मैं औरत हूँ ” का 8 मार्च, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर मंचन

8 मार्च, 2017 यानी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर रंग चिन्तक मंजुल भारद्वाज द्वारा लिखित और निर्देशित नाटक “मैं औरत हूँ !” का मंचन दोपहर 4 बजे होमी भाभा सेंटर फॉर साइंस एजुकेशन के  मानखुर्द स्थिति ऑडिटोरियम में होगा.

नाटक – “मैं औरत हूँ !” – अपने होने , उसको स्वीकारने और अपने ‘अस्तित्व’ को विभिन्न रूपों में खंगोलने,अन्वेषित करने की यात्रा है . नाटक ‘मैं औरत हूँ!’ पितृसत्तात्मक भारतीय समाज की सोच , बधनों , परम्पराओं , मान्यताओं को सिरे से नकारता है और उससे खुली चुनौती देकर अपने ‘स्वतंत्र मानवीय अस्तित्व’ को स्वीकारता है . नाटक महिला को पुरुष की बराबरी के आईने में नहीं देखता अपितु ‘नारी’ के अपने ‘स्वतंत्र मानवीय अस्तित्व’ को रेखांकित और अधोरेखित करता है .

ये नाटक ‘कलाकार और दर्शकों’ के लिए आत्म मुक्तता का माध्यम है . नाटक में अभिनय करते हुए ‘जेंडर समानता’ की संवेदनशीलता से कलाकार रूबरू होतें हैं और नाटक देखते हुए ‘दर्शक’ ‘जेंडर बायस’ से मुक्त होते हैं . नाटक ‘मैं औरत हूँ’ कलाकार और दर्शक पर अद्धभुत प्रभाव छोड़ता है . ‘नारी’ मुक्ति का बिगुल बजा उसे अपने ‘अधिकार’ के लिए संघर्ष करने को प्रेरित कर ‘सक्षम’ करता है . इस नाटक की लेखन शैली अनोखी है . ‘नारी विमर्श’ पर लिखे इस नाटक को एक कलाकार भी परफ़ॉर्मर कर सकती है / सकता है और अनेक कलाकार भी .. इस नाटक की ‘हिंदी’ के अलावा अलग –अलग भाषाओँ में देश भर में हजारों प्रस्तुतियां हो चुकी हैं और निरंतर हो रही हैं ...

8 मार्च को होने वाली इस  प्रस्तुति में अश्विनी नांदेडकर,सायली पावसकर और कोमल खामकर अपनी ‘अभिनय’ प्रतिभा से नारी विमर्श को एक नया आयाम देगीं !

Loka Manthan – a folk band of the IPTA

GUWAHATI, March 2 - Loka Manthan – a folk band of the Indian Peoples’ Theatre Association (IPTA) – with the objective of promoting the State’s multi-hued folk culture will stage its maiden show at Rabindra Bhawan at 4 pm and 6.15 pm on March 6.


Addressing a press conference, Nayan Prasad, convener, Loka Manthan, and noted singers Sudakshina Sarma and Tarali Sarma, today said that Loka Manthan would proceed with a vision and carry the message of peace and brotherhood, besides striving to promote and popularise folk songs, folk dance forms, folk instruments and folk culture in general among the masses, especially the youths.

“Loka Manthan will be a permanent and professional body that will endeavour to maintain the purity and uniqueness of Assamese folk culture in its myriad forms. We will promote our folk culture across the country and abroad,” the artistes said.

Sadou Asom Bihu Sanmilani Samannayrakshi Samiti and Sadou Guwahati Bihu Sanmilani have welcomed the initiative and assured Loka Manthan of all possible assistance.

-The Assam Tribune