Wednesday, October 30, 2013

IPTA's 70th anniversary in West Bengal

To commemorate 70th anniversary of Indian People’s Theatre Association, a 2 days programme of multifarious events was organised by  Indian Peoples Cultural Association, Kolkata unit  in South Kolkata (Behale) on 7th & 8th September in Barisha Jankalyan Vidyapith and Behala Blind School. On 7th September, in cultural competition in the presence of nearly 500 heads more than 200 competitors took part in dance, song, recitation events as per age wise group.

While inaugurating the cultural competition the Headmaster of Jankalyan Vidyapith Sri Sudip Goswami urged the participants to serve the society with their attractive resources according to the social commitment of the great IPTA. Achal Halder, Secretary  of Kolkata unit was in opening song.

On 8th, in blind schools packed auditorium there was a discussion on IPTA in the beginning. Thereafter prize distribution to the successful competitors followed by cultural items on songs, dances, story reading concluded with a drama “ Dui Bigha Jomi” written and directed by Achal Halder performed by IPCA, Kolkata unit.

Inaugurating the discussion, renowned dramatist and IPCA President Chandan Sen narrated contribution of  the organisation. Samik Bandopadhyay, Vice President of IPTA National  Committee as Chief Guest elaborated the glorious role of the organisation very effectively.     

Tuesday, October 29, 2013

हिन्दी साहित्य का एक स्तंभ टूट गया

टना/29 अक्टूबर 2013 I बिहार इप्टा राज्य परिषद् के कार्यकारी दल ने हिन्दी साहित्य जगत से जुड़े उपन्यासकार, कहानीकार, कविता और आलोचना सहित साहित्य की तमाम विधाओं में एक जैसी पकड़ रखने वाले राजेंद्र यादव के निधन पर शोक व्यक्त किया है और उनके निधन को हिंदी साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति बताया। बिहार इप्टा के महासचिव तनवीर अख्तर ने अपने शोक सन्देश में कहा कि राजेंद्र यादव हिन्दी साहित्य की मासिक पत्रिका हंस के संपादक थे। जिस हंस पत्रिका का संपादन कभी प्रेमचंद ने किया था, उसी पत्रिका का सबसे लंबे वक्त तक संपादन करने का श्रेय राजेंद्र यादव को जाता है। जिस दौर में हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाएं अकाल मौत का शिकार हो रही थीं, उस दौर में भी हंस का लगातार प्रकाशन राजेंद्र यादव की वजह से ही संभव हो पाया। मौजूदा दौर में राजेंद्र यादव को हिन्दी साहित्य की कई प्रतिभाओं को सामने लाने का श्रेय जाता है। उनके असामयिक निधन से हिन्दी साहित्य का एक स्तम्भ टूट गया हैI
इप्टा के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव फ़ीरोज़ अशरफ खां ने कहा कि राजेंद्र यादव हिन्दी साहित्य का एक मजबूत स्तंभ थे। 28 अगस्त 1929 को आगरा में जन्मे राजेंद्र यादव की गिनती चोटी के लेखकों में होती रही है। उन्होंने अपनी बेबाक लेखनी से ना सिर्फ हिन्दी समाज पर कटाक्ष किया बल्कि साहित्य में स्त्री और दलित विमर्श को एक आयाम दिया। उनके जाने हिंदी पत्रिका आन्दोलन गहरा आघात लगा हैI

Sunday, October 27, 2013

बिहार इप्टा ने की बम धमाकों की निंदा

टना, 27 अक्टूबर, 2013 । भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा), बिहार राज्य परिषद् के कार्यकारी दल ने भाजपा द्वारा गाँधी मैदान, पटना में आयोजित रैली के पूर्व हुए सीरियल बम विस्फोट की तीव्र निन्दा की है तथा इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है।

हम इस घटना की घोर निन्दा करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यह बिहार के समृद्ध साझी सांस्कृतिक विरासत का तोड़ने की कोशिश है । बिहारीजन सामाजिक ताने-बाने को तोड़ ने  की नापाक साजिश को कामयाब नहीं होने देंगे।

(तनवीर अख्तर)

I don't know how many times I have seen Garm Hava : M.S. Sathyu

Legendary filmmaker MS Sathyu has watched his film "Garm Hava" countless times in almost 40 years since it was made. Each time, the movie, based in post-independence era, leaves him emotionally charged. At the Abu Dhabi Film Festival (ADFF) here, it was no different.

The audience joined him in his sentiment post the screening, which set the ball rolling for the 'Celebrating Indian Cinema' special programme of the fest as a mark of Indian cinema's centenary year. They listened to Sathyu's predicament in making a film which was "more sympathetic to the Muslim community, managing it on a `beggar's budget' and fighting the Indian censors.

"This film is a bit heavy on the heart. I don't know how many times I have seen it, but every time I get emotionally charged," Sathyu, 83, said here Friday as he addressed the gathering of curious film buffs.

He was emotional also because the screening took place in the birth centenary year of the film's lead actor Balraj Sahni, who died a day after completing the dubbing for this film. "Garm Hava", called "Scorching Winds" in festival circuits, tells the tale of a Muslim family staying in Agra. It showcases the hardships faced by the Muslim community in India post-partition, and how while many Muslims chose to leave India to settle in Pakistan, what behaviour was meted to those who decided to stay put. "The film was not passed by the censor board in India for a year. They felt it was more sympathetic to the Muslim community. I suffered a lot... my distributors had gone, and only with the intervention of then prime minister Indira Gandhi and (then) information minister IK Gujral, we were able to get through," Sathyu said.

Back in the 1970s, it was screened at the Cannes International Film Festival. What followed was a premiere in Paris, and then it was released in India - first in the southern market and later in the northern region upon "government request". The film captures the poignant subject with the sensitivity it deserves, and it is no wonder that it was also chosen as India's entry for the best foreign language film category at the Academy Awards.

Shot in 35 mm Eastman Colour, "Garm Hava" took the team to Agra and Fatehpur Sikri. There were "no sets, no dolly, no trolley, no cranes", just one lens and 40 to 45 days of shooting in one stretch, said Sathyu.

Another surprising fact that the filmmaker shared was that since he had a "beggar's budget", he couldn't afford to record the sound while shooting. So, he edited the final cut as a silent movie. It was then that he got all the actors, most of whom were part of the Indian People's Theatre Association, to dub for it.

A young filmmaking student was in awe. So were others, who applauded the filmmaker for his vision and for telling a complex tale so simply, yet convincingly.

Courtesy :

Thursday, October 24, 2013

क़िस्सा कोताह : पुराने दिनों के गायब होते लोगों के किस्से

राजेश जोशी
-संजय पराते

हिन्दी-साहित्य पाठकों के लिए राजेश जोशी जाना-पहचाना नाम है। वे एक साथ ही कवि-कहानीकार-आलोचक-अनुवादक-संपादक सब कुछ हैं। हाल ही में उनकी रचना ‘क़िस्सा कोताह’ (राजकमल प्रकाशन) सामने आयी है। राजेश जोशी के ही अनुसार, न यह आत्मकथा है और न उपन्यास। यह एक गप्पी का रोज़नामचा भर है- जो न कहानी है और न संस्मरण, यदि कुछ है तो दोनों का घालमेल- जिससे हयवदन विधा पैदा हो सकती है। गप्पी की डायरी के जरिये राजेश जोशी हिन्दी पाठकों को बेतरतीबवार नरसिंहगढ़ और भोपाल के, अपनी बचपन और परिवारजनों व दोस्तों के क़िस्से सुनाते हैं- जिसका न कोई सिरा है और न अंत। ये क़िस्से हैं, जो एक जुबान से दूसरे कानों तक, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक और एक स्थान से दूसरे स्थान तक अनवरत बहते हैं और इस बहाव के क्रम में उनका रुप-रंग-स्वाद सब कुछ बदलता रहता है- नहीं बदलती तो केवल क़िस्सों की आत्मा। चूंकि यह जीवन के क़िस्से हैं, सभी पाठक इनमें डुबकी मारकर अपने चेहरे खोज सकते हैं। राजेश जोशी सूत्रधार के रुप में केवल एक कड़ी हैं क़िस्सागो की-- बाक़ी तो क़िस्से हैं, जो बह रहे हैं अपने आप। तो फिर इन क़िस्सों को बुन कर जो रचना निकलती है, वह परंपरागत साहित्य के चैखटे को तोड़कर बाहर आती है, वह न कहानी के मानदंडों को पूरा करती है, न उपन्यास के और न संस्मरण के। साहित्य के बने-बनाये स्वीकृत ढांचे को तोड़कर राजेश जोशी जिस विधा को स्थापित करते हैं, वह है- हयवदन विधा। तो पाठकगण, राजेश जोशी के ‘क़िस्सा कोताह’ में आप इस विधा के दर्शन कीजिये। लेकिन इस विधा का रस तो आपको तब मिलेगा, जब आप तथ्यों को ढूंढने की जिद छोड़ दें। इन क़िस्सों में राजेश जोशी की कल्पनाशीलता और लेखन शैली का मज़ा लें। इन क़िस्सों में जोशी बार-बार विस्मृति से स्मृति की ओर यात्रा करते हैं, और किस्से सुनाते हुये स्मृति से विस्मृति की यात्रा शुरु कर देते हैं, यह भूल जाते हैं कि वे क्या सुना रहे थे और इस क्रम में एक नया क़िस्सा सामने आ जाता है।

साहित्य का एक काम यदि रसरंजन है, तो ‘क़िस्सा कोताह’शुरु से लेकर अंत तक रंजकता से भरपूर है। चूसनी आम को चूसने या रस निकालने की कला से सभी वाक़िफ होंगे। ‘फजीता’ (सब जगह अलग-अलग नामों से ऐसा प्रयोग होता है) के रुप में आम की अंतिम रस-बूंद का उपयोग भी सभी जगह होता है। प्रायः सभी घरों में ऐसे ‘नाना’ तो रहते ही हैं, जिनके पादने की जोरदार आवाज़’ के मजे बच्चे लेते ही रहते हैं, गप्पी की तरह। नाना के पाखाने का क़िस्सा वे कुछ यों सुनाते हैं: ‘भंगन के आने के पहले ही सुअर पाखाना साफ कर जाते थे। पाखाना जाते समय साथ में कुछ छोटे-छोटे पत्थर लेकर जाना पड़ता था। सुअर जब पीछे की तरफ से थूथन घुसाते तो पत्थर मारकर उन्हें भगाना पड़ता।’’ (पृष्ठ 26) इस क़िस्से को पढ़ते हुये अपनी स्मृति में मुझे विष्णु खरे की कविता ‘ सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा’ की ये पंक्तियां ताजा हो जाती हैं:

अब जब ज़िक्र निकला है तो तुम्हें याद आते हैं वे दिन
कि तुम जब बैठे ही हो
कि अचानक कभी घुस आता था कोई थूथन नहीं
बल्कि चूड़ियों वाला कोई सांवला सा हाथ
टीन की चैड़ी गहरी तलवार जैसा एक खिंचैना लिये हुये
फिर जैसे तैसे उठकर भागने से पहले आती थी
स्त्री हंसी की आवाज जो कहती थी
और पानी डाल दो बब्बू
और उसके बाद राख की मांग की जाती थी
जिसे राखड़ कहा जाता था राख कहना अशुभ होता

आज तो मोबाइल का जमाना है और इस टिप्पणी के लिखते-लिखते देश के टेलीग्रामों को बंद करने की घोषणा हो चुकी है। लेकिन तब के जमाने में तो फोन दुर्लभ चीज थी। दुर्लभ चीजों का सामाजिक मूल्य भी बहुत ज्यादा होता है। तब के जमाने में इसका उपयोग अपशकुन काटने के काम में होता था। नानी के सिर पर बैठे कौव्वे के अपशकुन को इसी के सहारे काटा गया था। लेकिन सोचिये, तब ऐसी फोन सुविधा होती, तो नानी का अपशकुन कैसे कटता?

गप्पी नरसिंहगढ़ के भूगोल और इतिहास को क़िस्साई अंदाज में बताता है। सभी जगहों का भूगोल उसके विशेष इतिहास को जन्म देता है। विंध्याचल की पहाड़ियों से घिरे नरसिंहगढ़ का क़िस्सा ‘डालडा सरकार’ (महाराज भानुप्रताप) से जुड़ता है, तो ‘आन’ फिल्म की शुटिंग, नरेश मेहता के बचपन और महादेवी वर्मा के प्रेम-क़िस्सों से भी जुड़ता है। नरसिंहगढ़ का किला नष्ट हो गया ( और इस संदर्भ में राजेश जोशी की राजनैतिक टिप्पणी है--‘‘पुराना सामंतवाद भूसा भरे शेर की तरह था, जिसकी आंखें कांच की अंटियों की थीं जो चमकती तो थीं लेकिन उनमें रोशनी नहीं थी।’’--पृष्ठ 21), लेकिन इतिहास के क़िस्से गप्पी की जुबान में जिंदा हैं।

किस्से तो भोपाल के भी हैं, जो नवाब हमीदुल्ला खां की रियासत थी, देश के आजादी के दिन भी! इसलिए 15 अगस्त, 1947 को जब देश आजाद हुआ, तो भोपाल में कोई बड़ा जश्न नहीं हुआ।’ (पृष्ठ 68) इससे विलीनीकरण आंदोलन में बहुत तेजी आ गयी। मास्टर लालसिंह, तरजी मशरीकी, बालकिशन गुप्ता, गोविंद बाबू, उद्धवदास मेहता, एडवोकेट सूरजमल जैन, शांति देवी, शिवनारायण वैद्य छोटे दादा, शिवनारायण वैद्य बड़े दादा.... आदि-इत्यादि कई लोग इस आंदोलन से जुड़े थे। सबके अपने-अपने किस्से हैं, जिसे राजेश जोशी गप्पी की तरह किस्साई शैली में हमें सुनाते हैं।

कांग्रेस से जुड़े तरजी साहब विलीनीकरण आंदोलन के डरपोक सिपाही थे। एक मीटिंग में अपने डर को छुपाने के लिये ऊंची आवाज़ में गरजकर बोले.... आपको पता है....पता है आपको....ब्रिटेन ने जब बरतानिया पर हमला किया, तो लंदन तबाह हो गया।’ (पृष्ठ 47) लेकिन प्रजामंडल से जुड़े छोटे दादा थे बड़े गुस्सैल और बात-बात में गालियां बकते थे, क्योंकि उनका मानना था कि उनके पास गाली बकने का लाइसेंस है। भोपाल में यह लाइसेंस बिना किसी टैक्स के सबको हासिल था।’ (पृष्ठ 42) सो माना जाये कि राजेश जोशी को भी था (है)। वे भी इस ‘हयवदन विधा’ में इन गालियों के कुछ नमूने पेश करते हैं, लेकिन काशीनाथ सिंह (‘काशी का अस्सी’) के आगे फीके हैं। ठूंसी हुयी गालियां काशीनाथ सिंह का तो मजा नहीं दे सकतीं!

बहरहाल, 1 जून, 1949 को भोपाल रियासत स्वतंत्र भारत का हिस्सा बना। भोपाल के नेताओं और मौलाना आजाद के प्रयासों से भोपाल मध्यप्रदेश की राजधानी बना और शंकरदयाल शर्मा पहले मुख्यमंत्री। पांच मंत्री और 25 विधायक। राज्यपाल की जगह कमिश्नर सरकार का मुखिया। एक आशु कवि खुशाल कीर का दोहा गप्पी के किस्से में दर्ज हो गयाः

पांच पंच कुर्सी पर बैठे
फट्टन (टाटपट्टी) पर पच्चीस
राज करन को एक कमीश्नर
झक मारन को तीस।

लेकिन रानी कमलापति से नवाब दोस्त मोहम्मद खां को मिले भोपाल का भूगोल गलियों, चैकों, मौहल्लों, तालाबों व मस्ज़िदों के किस्सों के बिना पूरा नहीं होता। जहां लोग-बाग बसते हों, किस्से भी वहीं जन्म लेते हैं। तो भोपाल किस्सों का शहर है, क्योंकि यहां जितनी गलियां, उतने किस्से; जितने चैक-मौहल्ले, उतने किस्से; हर तालाब के अपने किस्से और मस्ज़िदों के भी। और इन सभी किस्सों में इतिहास की मिलावट। बिना सन् बताये (और इस तरह इतिहास को बोझिल किये बिना) राजेश जोशी इन तमाम किस्सों को कहते-बतियाते चलते रहते हैं-- ठीक किसी चलचित्र की तरह-- जैसे पुराने जमाने के लोग और कैरेक्टर एक के बाद एक जिंदा हो उठे हों। राजेश जोशी गप्पी की स्मृतियों के सहारे पुराने दिनों की धड़कन हमें सुनाते हैं-- सबसे बुरे दिनों के अनुभव भी किसी मजेदार किस्से की तरह। इन सबसे मिलकर ही गप्पी की स्मृति में भोपाल शहर बसता है-- जिसमें दादा खै़रियत है, तो बिरजीसिया स्कूल और उसके मास्टर भीः दादा खै़रियत हमेशा सिर झुकाकर चलते थे। शह र के विशाल दरवाज़ों के नीचे से निकलते तो थोड़ा सिर और झुका लेते जैसे दरवाजा किसी भी वक्त उनके सिर से टकरा जायेगा। (पृष्ठ 62) वैसे ये सब जिंदा पात्र ही मिलकर राजेश जोशी के साहित्यिक व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। पाठकों का इन कैरेक्टरों से कोई पहली बार सामना नहीं हो रहा है। राजेश जोशी की कविताओं और डायरियों से वे इनसे भली-भांति परिचित हैं। ‘किस्सा कोताह’ में तो चरित्रों का बस पुनर्जन्म हो रहा है। राजेश जोशी की कविता में ‘दादा ख़ैरियत’ इस तरह उतरते हैं:

कैसा गुरूर अपने कद का दादा ख़ैरियत को
कि खत्म हो चुकी नवाबी रियासत का
बचा हुआ यह आखरी दरवाजा
छोटा पड़ता हैं उन्हें
तनकर निकलने के लिए आज भी।

अपनी एक दूसरी कविता ‘रफीक मास्टर साहब और कागज के फूल’ में वे बिरजीसिया स्कूल के रफीक मास्टर साहब को गणित पढ़ाने और कागज के बहुत सुन्दर फूल बनाने के लिए याद करते हैं, न कि 1952 के दंगों में मारे जाने के लिये।

लेकिन इन किस्सों को कहते राजेश जोशी की वर्तमान पर भी सधी नजर है। किस्सों के बीच जगह-जगह दबी-फंसी उनकी टिप्पणियां इसकी गवाह हैं। एक टिप्पणी का जिक्र तो ऊपर कर चुके हैं। कुछ और टिप्पणियां:

- बाजार के पागलपन ने असल पागलों की सारी जगहों को हथिया लिया है। (पृष्ठ61)
- यह भारतीय इतिहास का सबसे बुरा तिरंगा था। (पृष्ठ 72)
- तानाशाही लिखे हुये शब्द पर प्रतिबंध लगा सकती है। छपे हुये शब्द पर काली रोशनाई फेर सकती है। किताब और पत्रिका को जलाकर खाक कर सकती है। लेकिन कहा जाता है न ....। बोला गया शब्द लिखे हुये शब्द से ज्यादा स्वतंत्र होता है। किस्सा तानाशाह की पहुंच के बाहर होता है। .....वह घुमन्तों की कला है। नागार्जुन ने कहीं कहा था कि अपने देश में लिखने से ज्यादा जरूरी बोलना है। किस्सा बोलने की कला है। कहने-सुनने की कला।... (पृष्ठ 113)
-स्मृतियों की बायोलाजिक क्लाक पर कोई भी शासक इमरजेंसी लागू नहीं कर सकता। (पृष्ठ 144)
- इमरजेंसी में बने चुटकुले अगर इकट्ठे कर लिये जाते तो जनता के वास्तविक गुस्से का अंदाजा लगाया जा सकता था। (पृष्ठ 160)

इन टिप्पणियों से स्पष्ट है कि भोपाल शहर राजेश जोशी के लिए केवल ‘अतीत का इतिहास’ ही नहीं है, बल्कि ‘वर्तमान की रणस्थली’ भी है। भोपाल ही वह शहर है, जिसने राजेश जोशी को राजेश जोशी बनाया- वामपंथी चेतना से लैस। भोपाल शहर ने ही उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का निर्माण किया। भोपाल के इस ताजा इतिहास को वे बड़ी आत्मीयता से पेश करते हैं।

विलीनीकरण आंदोलन के नेता कहीं विलीन नहीं हुये थे। अब उनकी भूमिकायें जरूर बदल गयी थीं। चार लोगों- बालकिशन गुप्ता, गोविंद बाबू, मोहिनी देवी और शाकिर अली खान’-- की पार्टी का शहर में अच्छा-खासा प्रभाव था और शाकिर अली खान ही हमेशा विधानसभा का चुनाव जीतते। लेकिन भोपालियों में जो गप्प उड़ाने का हुनर था उसका दुरूपयोग होना शुरू हो चुका था। हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग में होड़ चल रही थी। यहएक सार्वजनिक कॉमेडी की तरह’ थी। किसी किस्म का तनाव नहीं था। लेकिन धीरे-धीरे तनाव पैदा करने के उपाय खोजे जा रहे थे। (पृष्ठ 80) वे सफल हुये और रंगपंचमी के दिन अचानक दंगा शुरू हो गया। गप्पी की स्मृति में एक शांत, सौहार्दपूर्ण शहर के दंगाग्रस्त शहर में तब्दील होने के किस्से मौजूद हैं। भोपाल शहर ने गप्पी को दंगों-द्वेषों की नहीं, गंगा-जमुनी तहजीब की चेतना दी।

अपने छात्र जीवन में ही जोशी कम्युनिस्ट नेताओं के संपर्क में आ चुके थे। इसी के साथ नौकरी के लिये जीवन और घर-परिवार के आवश्यक तनाव....और फिर भोपाल में बैंक की नौकरी। नौकरी के साथ ही भोपाल शहर ने उन्हें साहित्यक-सांस्कृतिक तमीज भी दी। यहीं वे वेणुगोपाल के संपर्क में आये और उन्हें गढ़ने में वेणु के योगदान के किस्सों को गप्पी याद करता है। सोमदत्त, फज़ल ताबिश और शरद जोशी से भी उनकी पहचान वेणु के माध्यम से ही हुयी। रामप्रकाश त्रिपाठी ग्वालियर के छात्र आंदोलन के नेता थे तथा भोपाल में हिन्दी ग्रंथ अकादमी में कार्यरत थे। इसी समय माकपा ट्रेड यूनियनों का काम शुरू हुआ। इस प्रकार  राजेश जोशी का कमरा गप्पबाजी , आंदोलन और साहित्यिक चर्चाओं का अड्डा बन गया।

1973 के अंतिम दिनों में उन्होंने वेणु के साथ प्रगतिशील लेखक संघ के बांदा सम्मेलन में हिस्सा लिया। असगर वजाहत, सनत कुमार, धूमिल, विजयेन्द्र, सव्यसाची, मन्मथनाथ गुप्त, चंद्रभूषण तिवारी, कर्ण सिंह चैहान- आदि सबसे वे यहीं मिले। इस सम्मेलन ने एक नये गप्पी को जन्म दिया।

अपनी गतिविधियों के कारण वे पुलिस की नजर में आ चुके थे। इमरजेंसी लगने के बाद के दिन काफी त्रासद रहे। नागरिक अधिकार निलंबित हो चुके थे और संघर्ष की तमाम ताकतों ने एक समझदारी भरी चुप्पी ओढ़ ली थी। संजय गांधी इस नये जमाने के नये राजकुमार थे। आपातकाल, इंदिरा गांधी और संजय गांधी पर चुटकुले-किस्से हवा में तैर रहे थे। बापू का डंडा जनता के पृष्ठ भाग में घुसेड़ दिया गया था। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ कांग्रेस के पास शरणागत थी और उसके कार्यकर्ता संजय गांधी की रैलियों को सफल बनाने में जुटे थे। भोपाल में पटिया-पोलेटिक्स पर बंदिश लग चुकी थी, क्योंकि पटियों पर सरकार को लगता होगा कि फालतू बैठे लोगों के बीच खतरनाक विचार पनपते हैं।’ (पृष्ठ 162) आम लोगों के लिये देर रात का भोजन और देर रात की चाय-सिगरेट जुटाना भी मुश्किल हो गया था।

 ये लगभग 30 सालों के किस्से हैं- स्वतंत्रता पूर्व जन्म से लेकर आपातकाल तक का-जब आधी रात को मिली आजादी आधी रात को छीन ली गयी थी।’ इस आपातकाल में जिस ‘अनुशासन पर्व’ को मनाया गया, उसके खिलाफ छटपटाहट भी मौजूद है, क्योंकि जेल के बाहर का शहर ज्यादा बड़ी जेल में बदल गया था। इस बड़ी जेल के खिलाफ देश की जनता का संघर्ष ‘ऐतिहासिक’ था। इस ‘दूसरी आजादी’ और उसके बाद के समय के किस्से राजेश जोशी पता नहीं कब बुनेंगे, लेकिन एक चिड़िया के घोंसले बनाने के रुपक से वे अपनी ‘हयवदन विधा’ को विराम देते हैं। उन्हें उसके अंडों से बच्चों के निकलने और उनके उड़ान भरने का इंतजार है। और पाठकों को भी इसी का इंतजार रहेगा कि उनका इंतजार कब खत्म होता है, क्योंकि हमें अगले 30-40 सालों के किस्से और सुनने हैं और इसी ‘हयवदन विधा’ में बाद के इन सालों के किस्से एक नये भारत के निर्माण के संघर्ष के किस्से होंगे जो!

‘किस्सा कोताह’ पढ़ते हुये मुझे लगातार ‘काशी का अस्सी’ (काशीनाथ सिंह) की याद आती रही। ‘15 पार्क एवेन्यू’ नामक फिल्म को देखकर राजेश जोशी को जो पहली कृति याद आयी यह काशी का अस्सी थी।.... ’’(15 पार्क एवेन्यू ) इस अंत में ना आशा है न निराशा। न यह तार्किक है न यौक्तिक। यह उस कथा की समस्या है या हमारे समय और हमारे यथार्थ की? शायद हम एक ऐसे समय में हैं जहां अपनी यथार्थवादी कथा के लिये कोई यौक्तिक, कोई बुद्धिसंगत अंत ढूंढ़ना असंभव सा लगता है। यहां लगभग एक अतार्किक सी फंतासी ही रचनाकार की मदद कर सकती है। काशी का अस्सी भी दिनों-दिन गायब हो रही हंसी का एक लंबा रुपक है।.... यह यथार्थ कथा भी अपने निजी अंत तक पहुंचने के लिये यथार्थ से बाहर आकर एक फैंटेसी की शरण लेती है। शायद यही हमारे समय की कथा की तार्किक और विवेकपूर्ण नियति भी है और प्रविधि भी।’’ (बनास, अंक दो, वर्ष 2009) क्या ‘किस्सा कोताह’ और ‘15 पार्क एवेन्यू’ में कोई सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है?

संजय पराते
नूरानी चैक, राजा तालाब, रायपुर(छ.ग.)

अपने समय का नया बिंब रच रही है कविता

इंदौर, 22 अक्टूबर 2013। कविता और उसके कथ्य, भाषा व शैली के बदलावों को परखने की जरूरत हर समय में रही है क्योंकि उससे समाज की सतह के भीतर होने वाली वर्तमान की धड़कनों व भविष्य की पदचापों को सुना जा सकता है। अब जब हमारा वर्तमान ही बहुत जटिल हो गया है तो अनेक लोग इसका सीधा निष्कर्ष यह निकालते हैं कि कविता भी इसीलिए जटिल होगी ही। यह निष्कर्ष गलत है। दरअसल सच तो यह है कि जटिल वर्तमान ने कविता रचने की प्रक्रिया को अधिक मुश्किल बना दिया है। मुक्त छंद हो जाने से सबको लगता है कि अब कविता कोई भी कर सकता है। यह सच भी है। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि जो लोग कविता को इस दुनिया को सुंदर बनाने के एक औजार के रूप में देखते हैं, उन्हें कविता लिखने और समझने के लिए अपने समय व समाज की जटिलताओं को जानना ही पड़ेगा। कविता स्वयं में भोली नहीं है, बल्कि वह भोलेपन और मासूमियत की रक्षा के लिए तैयार एक समझदार प्रयास है। हमारे समय की कविता जिन प्रश्नों से मुठभेड़ कर रही है वे समाज, संस्कृति और भाषा के जरूरी सवाल हैं और यह कविता अपने समय का नया बिंब रचती है।

यह बातें मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा इंदौर के करीब स्थित प्राकृतिक स्थल कालाकुंड में 19-20 अक्टूबर 2013 को आयोजित दो दिवसीय कविता शिविर के दौरान सामने आईं। पहाड़ों से घिरे व नदी के किनारे पर मौजूद यह शिविर पेड़ों की छाँह में लगा और कविता के विभिन्न पहलुओं पर निर्बाध विचार-विमर्ष और साथ ही कविता-पाठ लगातार दो दिन चलता रहा। शिविर में इंदौर के साथ ही भोपाल, लखनऊ, चित्तौड़गढ़, अहमदाबाद, चुरू, सेंधवा एवं अन्य स्थानों से आये 20 से ज़्यादा प्रतिभागियों ने भागीदारी की।
सभी युवा कवियों ने अपनी कविताएं सुनाई, जिनके बहाने कविता की भाषा, शैली, कथ्य के साथ-साथ कविता की ज़रूरत पर भी बातचीत की गई। शिविर के दौरान कविता के उपयोगितावाद से लेकर कविता के भविष्य तक पर गहन बातचीत हुई। शिविर में भोपाल से आये कवि अनिल करमेले, म. प्र. प्रलेसं के महासचिव व कवि विनीत तिवारी ने विभिन्न कविताओं पर उदाहरणों के साथ समीक्षकीय बातें रखीं और सभी प्रतिभागियों को लगातार लेखन के लिए प्रोत्साहित किया।

पहले दिन परिचय सत्र से शिविर की औपचारिक शुरुआत हुई। इसके तुरंत बाद दूसरे सत्र में विश्व कविता पर बातचीत के दौरान विषय प्रवेश करते हुए विनीत तिवारी ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद की योरपीय कविता (ब्रेष्ट, लोर्का, ज़्बीग्नेयेव हेर्बर्त से लेकर विस्साव शिम्बोस्र्का तक), भाषायी व आर्थिक साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ अपनी गौरवपूर्ण पहचान के साथ उभरी अफ्रीकी कविता को चीनुआ अचेबे, न्गूगी वा थ्योंगो, और केन सारो वीवा के हवाले से, लैटिन अमेरिका के भीतर पाब्लो नेरुदा से लेकर निकोनार पार्रा व रोक डाल्टन और एशिया के भीतर महमूद दरवेश, अहमद फ़राज़, से लेकर दून्या मिखाइल तथा वियतनामी कविताओं के संदर्भों के साथ विश्व कविता का एक परिदृष्य तैयार किया गया।

इस सत्र में अपनी बात रखते हुए युवा कवि विपुल शुक्ला ने विश्व कविता के कुछ अनुवाद सुनाए। इस दौरान कविता के उपयोगितावाद पर भी बात हुई कि किसी अच्छी कविता का इस्तेमाल कोई आंदोलन करना चाहे तो कर ले लेकिन कोई कवि कविता का उपयोग सोचकर तब तक माँग के आधार पर अच्छी कविता नही लिख सकता जब तक कि वह जीवन में भी उसके साथ न जुड़ा हो। इसलिए कविता को उपयोगितावादी नज़रिये से देखना उचित नहीं है। सरलता व जटिलता के मानकों पर भी बात हुई।

दोपहर के सत्र में नये कवियों की कविताए सुनी गईं और उन पर सभी ने अपनी-अपनी बात रखी। इस सत्र में इंदौर के नितिन बेदरकर, अलीम रंगरेज, सागर वाधवानी, विभोर मिश्रा व लखनऊ के विवेक मालवीय ने अपनी कविताएँ सुनायीं जिन पर बाकी भागीदारों ने अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएँ दीं। कुछ कविताओं के बहाने उर्दू कविता के विशाल और उसके आज के परिदृष्य पर सार्थक चर्चा हुई। नये कवियों के भीतर की संभावनाओं को, उनके उठाये गए नये विषयों व बिंबों को सराहा गया तथा विस्तार के मोह तथा दोहराव जैसे दोषों की ओर उनका ध्यान खींचा गया।

यही क्रम रात्रि भोज के बाद शरद पूर्णिमा के चाँद की रोशनी और अलाव की गर्मी के साथ तीसरे सत्र में शुरू हुआ। रात दो बजे तक चले इस सत्र में अजय काशिव (चुरु), पीयूष पंड्या (अहमदाबाद), निशांत गंगवानी (इंदौर), विपुल शुक्ला, हेमंत देवलेकर (भोपाल) तथा सौरभ अनंत (भोपाल) ने अपनी कविताएँ सुनाईं। इस दौरान कविता की भाषा, विषयों के चयन के साथ किसी विचार या युक्ति से कविता को बुनने के अच्छे व बुरे उदाहरणों पर भी बात हुई।

दूसरे दिन के पहले सत्र में सुबह 9.30 बजे रचना पाठ का तीसरा दौर शुरू हुआ, जिसमें सुदीप सोहनी (भोपाल), इंदौर के केशरी सिंह चिड़ार, सचिन श्रीवास्तव और एस. के. दुबे ने कविताएँ सुनाईं। इसी सत्र में आलोचना व कविता के रिश्तों व आलोचना की ज़रूरत व भूमिका पर भी विस्तार से बात हुई।

शिविर के समापन अवसर पर कवि उत्पल बैनर्जी (इंदौर) ने रवीन्द्र नाथ ठाकुर के बाद की बांग्ला कविता में अलग-अलग वक्त पर सामाजिक-राजनीतिक बदलावों से आये असर पर रोशनी डाली और अनिल करमेले (भोपाल) ने अपनी कविताओं से समकालीन हिंदी कविता के कलात्मक रूप से सशक्त राजनीतिक व प्रगतिशील चेहरे को उपस्थित शिविरार्थियों के सामने रखा। पूरे शिविर में इंदौर की समीक्षा दुबे, सुरेश डूडवे व सारिका श्रीवास्तव ने आलोचक व श्रोता की सजग ज़िम्मेदारी को निभाया। समापन कार्यक्रम में इंदौर से इस शिविर में शामिल होने के लिए भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा), इंदौर के साथी प्रमोद बागड़ी व अशोक दुबे एवं रूपांकन से शारदा मोरे व सिद्दीक खान, तथा आम आदमी पार्टी के अजय लागू भी कालाकुंड पहुँचे। 

शिविरार्थियों ने शिविर को अपनी समझ के विस्तार के लिए बहुत उपयोगी बताया व भविष्य में भी ऐसे शिविरों के आयोजन की अपेक्षा सामने रखी। आभार प्रकट किया म. प्र. प्रगतिशील लेखक संघ के प्रांतीय कोषाध्यक्ष श्री केसरी सिंह चिड़ार ने।

विनीत तिवारी

Monday, October 14, 2013

इप्टा भिलाई : तीसरी अंतर महाविद्यालयीन नाट्य स्पर्धा संपन्न

क ऐसे नाजुक दौर मे जब छत्तीसगढ़ का युवा या तो कम्पयूटर नेट वर्क की सोशल साइट्स में उलझा हो या रंगमंच को सिर्फ अभिनय के रूप में फिल्मों में जाने की सीढ़ी मानता हो उन्हें भिलाई इप्टा की तीसरी अंतर महाविद्यालयीन नाट्य स्पर्धा ने वैचारिक रूप से रंगमंच से जोड़ने का काम किया।इप्टा भिलाई द्वारा 30 सितम्बर और 1 अक्टूबर 2013 को आयोजित इस प्रतियोगिता में दुर्ग-भिलाई के कुल 14 महाविद्यालयों के 186 छात्र छात्राओं ने भाग लिया। पहले दिन कुल छः तथा दूसरे दिन आठ नाटकों के मंचन हुये. सामायिक विषयों पर खास कर महिला उत्पीडन,महिला सशक्तिकरण,धार्मिक उन्माद,पर्यावरण विषयों पर केन्द्रित नाटक स्पर्धा की विशेषता थी।

प्रतियोगिता का उदघाटन छत्तीसगढ़ इप्टा के अध्यक्ष मधुकर गोरख (बिलासपुर) ने किया छत्तीसगढ़ इप्टा के सचिव मंडल के सदस्य अजय आठले (रायगढ़) छत्तीसगढ़ इप्टा के उपाध्यक्ष मिन्हाज असद (रायपुर) प्रसिद्द गायक प्रभंजय चतुर्वेदी इस अवसर पर उपस्थित थे। श्री मधुकर गोरख, अजय आठले और सुचित मुखर्जी इस प्रतियोगिता के निर्णायक भी थे। समापन समारोह के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय इप्टा के उपाध्यक्ष श्री अंजन श्रीवास्तव थे। इस अवसर पर मुंबई इप्टा के निर्देशक रमेश तलवार,अवतार गिल भी उपस्थित थे।
कुछ समय से रंगमंच के प्रति युवाओं में अरुचि स्पष्ट नजर आ रही थी एसे समय में इप्टा भिलाई के इस आयोजन ने युवाओं में नई स्फूर्ति प्रदान की।

बलराज साहनी की स्मृति में घोषित प्रथम पुरस्कार(पाँच हजार रु.और स्मृति चिन्ह ) मनसा कालेज ऑफ़ एजुकेशन के नाटक "दिल्ली से डर लगता है"को.कैफ़ी आज़मी की स्मृति में घोषित द्वितीय पुरस्कार(तीन हजार रु. और स्मृति चिन्ह ) गवर्मेंट पी.जी. कालेज दुर्ग के नाटक "धरम की जय हो"को तथा हबीब तनवीर की स्मृति में घोषित तृतीय पुरस्कार(दो हजार रु. और स्मृति चिन्ह) कल्याण कालेज भिलाई के नाटक "पागल खाना" को प्राप्त हुआ। शासकीय महाविद्यालय उतई के नाटक "आधी आबादी का हिस्सा" तथा स्वामी स्वरूपा नन्द कालेज के नाटक "हम हैं उत्तराखंड" को ए के हंगल की स्मृति विशेष सान्त्वना पुरष्कार(स्मृति चिन्ह) दिया गया। सर्वश्रेठ अभिनेत्री प्रथम मीरा शुक्ला (दिल्ली से डर लगता है),द्वितीय अर्चना ध्रुव (पागल खाना),तृतीय आरती सूर्यवंशी (धरम की जय हो )को तथा सर्वश्रेठ अभिनेता प्रथम भाविक रूपड़ा (पागल खाना),द्वितीय दिलेश्वर साहू (धरम की जय हो ),तृतीय किशन सिन्हा (गोविन्द सिंह की डायरी ) को तथा अदिति खरे(पागल खाना) एवं एम कार्तिक राव (गोविन्द सिंह की डायरी ) को क्रमशः सर्वश्रेठ चरित्र अभिनेत्री एवं चरित्र अभिनेता के पुरस्कार प्रदान किये गए।

इप्टा भिलाई ,सहयोगी संस्था भगत सिंह जन्म स्मृति समारोह समिति तथा भिलाई इस्पात संयंत्र के सहयोग से भगत सिंह और महात्मा गाँधी जन्म दिवस पर आयोजित पाँच दिवसीय कार्यक्रम की शुरुआत 28 सितम्बर 20 3 को पवार हाउस पर भगत सिंह की मूर्ति के अनावरण से हुई। मूर्ति का अनावरण पदमश्री नेल्सन ने किया। 29 सितम्बर को कुल 116 युवाओं ने रक्त दान किया शाम को सिविक सेंटर में विशाल मशाल रैली निकाली गई। 30 सित. एवं 1 अक्टूबर को शानदार तृतीय अंतर महाविद्यालयीन नाट्य स्पर्धा तथा 2 अक्टूबर को गाँधी जयंती के अवसर पर "भगत सिंह-महात्मा गाँधी और भारत का विचार" विषय पर व्याख्यान आयोजित किया गया आधार वक्तव्य शैलेन्द्र (झारखण्ड) का था मुख्य वक्ता अपूर्वानंद (दिल्ली) थे अध्यक्षता कनक तिवारी(छत्तीसगढ़ ) ने की।

शाम को नेहरु सांस्कृतिक भवन में ही रमेश तलवार के निर्देशन मे इप्टा मुंबई के दो लघु नाटक "सरहद पर एक घटना" तथा अशफाक उल्लाह पर आधारित "हम दीवाने हम परवाने"के मंचन किये गये। नाटक के पूर्व कुलदीप सिंह और साथियों द्वारा जनगीत तथा नाटक मंचन के पशचात राजस्थान के सूफी गायक मीर मुख्तयार अली ने देर रात तक कबीर तथा सूफी गायन प्रस्तुत कर कार्यक्रम में शमा बांधा। भगत सिंह पर केन्द्रित इप्टा भिलाई का यह आयोजन भविष्य में युवाओं को इप्टा तथा रंगमंच से जोड़ने में मील का पत्थर साबित होगा।
राजेश श्रीवास्तव
महा सचिव (छत्तीसगढ़ इप्टा)

Monday, October 7, 2013

रचनाकार बदलती व्यवस्था का संकेतक है

गरा। डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के जुबली हॉल में परिचर्चा कार्यक्रम हुआ। इसमें शहर के उभरते हुए उपन्यासकार शक्ति प्रकाश के ‘हजारों चेहरे ऐसे’ उपन्यास पर चर्चा की। दिल्ली से आए वरिष्ठ व्यंगकार डॉ. प्रेम जनमेजय ने कहा कि रचनाकार बदलती व्यवस्था का संकेतक है। जहां बाजार स्वामी बन गया है और नारी वस्तु। वरिष्ठ कथाकार सूरज प्रकाश ने कहा कि उपन्यास में दमित इच्छाएं बेबाकी से प्रकाशित की गई हैं। केएमआई निदेशक प्रो. हरीमोहन शर्मा ने उपन्यास में आगरा के परिवेश के प्रस्तुतीकरण की सराहना की। 

वरिष्ठ रंगकर्मी जितेंद्र रघुवंशी ने कहा कि स्त्री शिकार से शिकारी बनने की कोशिश करती है, लेकिन मर्दवादी वर्चस्व का शिकार बनना ही नायिका की नियति है। इप्टा के कलाकारों ने उपन्यास की कहानी पर नुक्कड़ नाटक किए। प्रो. जय सिंह नीरद, मिर्जा शमीम, नीतू दीक्षित, डॉ. विजय, मानसी, सूरज आदि रहे।

• अमर उजाला से साभार

Saturday, October 5, 2013

Cuttack : Balraj Sahani Birth Centenary Celebration Competition Programme

Reported by-Nikunj Bhutia, executive member, IPTA, Cuttack.

On the eve of the centenary celebration of veteran Bollywood actor Late Sri Balraj Sahani, various competition programmes was organized by IPTA Cuttack, among school children starting from Nursery to 12th standards on 29th September 2013.The competition was held at Mahamaya M E School, Uchha Sahi, Kesharpur, Cuttack. It included Fancy dress, Drawing, Song, Dance and Debate competitions.

The programme started by 8 am in the morning and continued till 5.30 pm in the evening. All the participants reached by 9am.IPTA Executive member Mr. Nikunj Bhutia welcomed all the Participants, volunteers, and Jury members to the venue place.

Though it was heavy rain throughout the day and the City was under heavy flood an encouraging number of participants dared the weather and reached the venue place. Some 40 girls and boys belonging to 21 different educational Institutions of Cuttack took part in all the categories of the competition.

Before the 29th programme, IPTA activists campaigned and approached about 50 educational institutions to take part in the competition. There could be even more participation if there was no examination in some schools and colleges.

The program was coordinated by Sri Susant Mahapatra, Nikunj Bhutia,Laxmidhar Dash,Mr. Simon,Laxmidhar Mahalik,Binod Behera,Ashok Das,Indrajeet Ghose, Bipin Padhi,Laxmi Karmakar, Bina Karmakar,Niharika Das,Hitesh Sharma, Miss. Harsha Samantray, Miss Sradha Priyadarsini Mishra, Samhati Mahapatra, Suresh Majhi, Premanada Swain, Tapas Ghose and secretary Krishnapriya Mishra.

All the winners and participants will be honored on 19th Oct 2013 in a separate function at Kala Vikash Kendra Cuttack. The result will be declared on that day only. Those who secured 1st, 2nd and 3rd position will be honored with a trophy and certificate while all other participants will be given a certificate of participation.
The president Mr. Puranjan Roy and state secretary Sri Ramesh Padhi joined and encouraged all the volunteers and participants. Tea, Tiffin and Lunch was served to volunteers and Jury members by IPTA.

At the end Secretary Krishnapriya Mishra thanked all participants, to all volunteers, all Jury Members, to management of the Mahamaya M E School, its head Master Mr, Dukhishyam Das. She also invited all members present to attend the 19th October programme at Kala Vikash Kendra for Balraj Sahani Centenary Celebration.

Tuesday, October 1, 2013

He set the stage for art to reach the masses

As a young boy, he bunked classes at primary school and instead teamed up with friends and enacted children’s version of Kathakali. A few years later, the passion took the teenager from Kodungallur to near Shoranur, to learn the classical art at a fledgling institute in the 1940s. That was how Vadakkedath Kanjiraparambil Gangadharan enrolled himself at Kalamandalam, defying the advice of his aristocratic parents.
While his batchmate Ramankutty Nair went on to become a purist’s celebrity, Gangadharan strayed from the orthodox Kalluvazhi style they were trained in, under the uncompromising Pattikkamthodi Ravunni Menon. The result was the introduction of a theatre genre that gained its own place in Kerala’s 20th century cultural history. And Kalamandalam Gangadharan became the pioneer of what came to be called ballet across the length and breadth of the State. As its characters in realistic costumes essayed stories by blending light dance with often dense drama, the simple narrative refreshed the aesthetics of a vast population.
Today, 15 years after Gangadharan’s death, his art form has lost much of its appeal in a milieu that is vastly different from the Kerala of the 1950s and 60s. That had been the time when Communism had spun much thicker wefts into the State’s cultural fabric.
It was that egalitarian spirit that led the dancer to wed KPAC Sudharma. The theatre artiste hailed from a contrasting socio-economic background and her lead role in epoch-defining play Ningalenne Communistakki won her a huge following among the masses.
The wedding in 1957, with the blessings of the (undivided) Communist Party of India, had actor Sankaradi as the best man. It meant Gangadharan was to settle in Kollam, the hometown of Sudharma, who was also a classical vocalist and veena player. It also turned out to be the year the dancer founded the Indian Dance Academy. Gangadharan already had his tryst with the Kollam from the early 1950s as one of Kerala’s founding members of the IPTA (the pro-Left Indian People’s Theatre Association).
Gangadharan had abandoned Kathakali after his course in Kalamandalam because he had begun to follow a changed line of thought. “Any art should have a theme or moral that would be of use to the common people,” he was quoted as saying in an interview published in 1990. “The dance should inspire them to try it out themselves; else the form won’t last long.”
Notwithstanding his migration from a circle of friends practising feudal-era arts to that of a revolution-seeking league, Gangadharan retained personal ties with his past.
The couple’s eldest daughter, Chitra Gangadharan, recalls her childhood in their house in suburban Kadappakada where they had visitors from divergent streams of the arts. “We had progressive theatre activist-writers such as Thoppil Bhasi, O.N.V. Kurup, P. Bhaskaran, Kakkanadan and Kambisseri Karunakaran. There were also father’s Kalamandalam contemporaries like Ramankutty Nair, Krishnankutty Poduval, Appukutty Poduval…”
Chitra, who used to dance and now teaches in a north Kerala college, remembers Gangadharan’s performance in his masterpiece Premashilpi. It was a 45-minute solo performance based on Pygmalion, the Greek mythological sculptor who falls in love with his own work of art. “As a child, I would watch in awe as my father would, at one point, stir his body like a ripple. It would gain vibrancy to look like massive waves; then recede before he’d freeze to stillness,” she says.
Chitra’s sister Lekha Sasikumar recounts that her parents had happily permitted her to realise her dream of learning Bharatanatyam. “Between them, my parents shared a strong bond,” she says. Sudharma’s death in early 1995 weakened Gangadharan’s health, she adds.
In an uncanny coincidence, the dancer died when his Academy was staging its swan song — only hours after Gangadharan had announced dissolution of the institution.
A recipient of honours such as the Union Ministry of Culture’s fellowship and the Kerala Sangeetha Nataka Akademi award, Gangadharan, whose famous disciples included actors KPAC Lalitha, Perunna Leelamani and Vijaya Lakshmi, never chased titles.
“He seldom treasured them either,” says his son, G. Santhosh. “Once from our backyard, we retrieved a medal he got after a Berlin show in 1973. I happened to dig it out in the early 1990s.”

Today, nuggets about Gangadharan and his life lie beneath layers of public memory.
The Hindu