Friday, October 30, 2015

“अनहद नाद" का मंचन 8 नवंबर को ठाणे में



8 नवम्बर (रविवार), 2015 को रात 8.30 बजे जाने माने रंग चिन्तक मंजुल भारद्वाज द्वारा लिखित और उत्प्रेरित बहुभाषिक नाटक “अनहद नाद-अन हर्ड साउंड्स ऑफ़ युनिवर्स” का डॉ.काशिनाथ घाणेकर नाट्यगृह ( मिनी थिएटर ) ठाणे में मंचन ! “अनहद नाद - अन हर्ड साउंड्स ऑफ़ युनिवर्स ” कलात्मक चिंतन है, जो कला और कलाकारों की कलात्मक आवश्यकताओं,कलात्मक मौलिक प्रक्रियाओं को समझने और खंगोलने की प्रक्रिया है। क्योंकि कला उत्पाद और कलाकार उत्पादक नहीं है और जीवन नफा और नुकसान की बैलेंस शीट नहीं है इसलिए यह नाटक कला और कलाकार को उत्पाद और उत्पादिकरण से उन्मुक्त करते हुए, उनकी सकारात्मक,सृजनात्मक और कलात्मक उर्जा से बेहतर और सुंदर विश्व बनाने के लिए प्रेरित और प्रतिबद्ध करता है । 

अश्विनी नांदेडकर ,योगिनी चौक, सायली पावसकर,तुषार म्हस्के और कोमल खामकर अपने अभिनय से नाट्य पाठ को मंच पर आकार देकर साकार करेंगें ! एक्सपेरिमेंटल थिएटर फाउंडेशन विगत २३ वर्षों से देश विदेश में अपनी प्रोयोगात्मक , सार्थक और प्रतिबद्ध प्रस्तुतियों के लिए विख्यात है .

Wednesday, October 28, 2015

ज़िंदगी के मंच से रांग एग्ज़िट मार गए जुगल किशोर!

- वीर विनोद छाबड़ा
२५ अक्टूबर की शाम बहुत ग़मगीन थी। दिवंगत साथी जुगल किशोर को याद करने के लिए बहुत बड़ी संख्या में लखनऊ के तमाम सुप्रसिद्ध रंगकर्मी और साहित्यकार और उनसे सरोकार रखने वाले भारतेंदु नाट्य अकादेमी में जुटे थे। जुगल के अकस्मात् चले से जाने से हर शख़्स शोक में डूबा था। 

संचालन करते हुए इप्टा के राष्ट्रीय महसचिव राकेश भी आंसू नहीं रोक पा रहे थे। आज वो व्यवस्थित नहीं थे। वो बता रहे थे - कल तक जो सामने था आज नेपथ्य में चला गया है। पिछले ४० साल में मैंने उसमें एक बहुत अच्छे अभिनेता, निर्देशक, प्रशिक्षक, लेखक और इंसान के रूप में देखा। 

जुगल को नाटक का ककहरा पढ़ाने वाले सुप्रसिद्ध वरिष्ठ प्रशिक्षक और रंगकर्मी राज बिसारिया ने कहा - वो मेरा बच्चा था। महबूब था। बरसों पहले इंटर पास एक दुबले-पतले नौजवान के रूप में भरपूर स्प्रिट के साथ आया था। उसकी स्प्रिट को सलाम। उसकी मसखरी का पात्र हमेशा मैं रहा। जो जितना दूर जाता है उतना ही पास रहता है। दुःख-दर्द बहुत गहरा होता है। उसकी ज़ुबान नहीं होती। आज का दिन रोने का नहीं, जश्न मनाने है। उसकी याद में खुद को मज़बूत करने का है। नाटक करो। यह ज़िंदगी का आईना है। अपने दौर में जुगल जितना कर गया, उसे मैं सलाम करता हूं। अपने फ़न से वो सबको हराता रहा, लेकिन खुद मौत से हार गया। जुगल हमारी सांसो में रहेगा। 

सुप्रसिद्ध समालोचक वीरेंद्र यादव की नज़र में रंगकर्म समाज का आईना है और जुगल ने इस सरोकार से सदैव रिश्ता बनाये रखा। इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ से जीवंत रिश्ता रखा। साहित्य से बहुत गहरा जुड़ाव रहा उनका। सदैव संभावना खोजा करते थे कि अमूक साहित्यिक कृति का नाट्य रूपांतरण कैसे तैयार किया जाये। खुद को समृद्ध करने के लिए साहित्यिक गोष्ठियों में अक्सर मौजूद रहते। सिनेमा में जाने के बावजूद वो रंगमंच से प्रतिबद्ध रहे। संस्कृति के लिए आज का समय बहुत ख़राब है। ऐसे में एक बहुत अच्छे साथी का चले जाना बहुत ही कष्टप्रद है। 

सुप्रसिद्ध वरिष्ठ रंगकर्मी सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ ने कहा - अभी तक सुना था कि मौत बहुत बेरहम होती है। चुपके से आती है। लेकिन आज देख भी लिया। सुबह उसने संगीत नाटक अकादमी का ईनाम मिलने की मुबारक़बाद दी और शाम को रुला दिया। जुगल का जाना रंगमंच की क्षति है, समाज की भी क्षति है। उसके साथ कई नाटकों में काम किया। हंसी मज़ाक और गप्पें मारना बहुत अच्छा लगता था। यह संयोग है कि वो नाटकों में मौत का बहुत शानदार अभिनय करता रहा। उसका जाना मेरी व्यक्तिगत क्षति है। मैंने एक दोस्त खोया है।
वरिष्ठ रंगकर्मी आतमजीत सिंह ने बताया - जुगल का जाना एक दर्दभरी घटना है। ऐसा लग रहा है जैसे कोई गंभीर रंगमंच चल रहा है। वो बड़ा स्तंभ था। उनका स्थान किसी के लिए लेना मुश्किल है। जुगल को याद करने का तरीका यही होगा कि नाटक चलता रहे। 

सुप्रसिद्ध लेखक-कवि नलिन रंजन सिंह ने बताया कि बहुत नज़दीकी रिश्ता था जुगल से। एक हंसता हुआ चेहरा। ज़िंदादिल इंसान थे वो। जब भी मिले, नए लोगों को रंगमंच से जोड़ने की संभावनाएं हमेशा तलाशते हुए। चिंतित रहते थे कि नई पीढ़ी रंगमंच के दायित्व का कैसे निर्वहन करेगी। ज़रुरत है कि उनकी चेतना से जुड़ कर या वैचारिक रूप से या लेखन के माध्यम से आगे बढ़ाया जाये। 

अलग दुनिया के केके वत्स ने बताया - सिनेमा से जुड़ने के बावजूद जुगल ने लखनऊ नहीं छोड़ा। याद नहीं आता कि उनका किसी से कोई मतभेद रहा हो। जुगल की याद में प्रत्येक वर्ष २५ हज़ार का एक पुरुस्कार मंच पर सामने या नेपथ्य में शानदार काम करने केलिए दिया जाएगा। इसकी शुरुआत उनके जन्मदिन २५ फरवरी से होगी। 

सुप्रसिद्ध वरिष्ठ अभिनेता अरुण त्रिवेदी का कहना था - मेरा जुगल से पिछले ३५-३६ साल से दिन-रात का साथ रहा। हम भारतेंदु नाट्य अकादमी में लगभग एकसाथ आये। रंगमंच से जुड़ी अनेक व्याधियों और कष्टों को एकजुटता से झेला। स्टेज ही नहीं बाहर भी हम एकसाथ रहे। प्रशासनिक अड़चनों के बावजूद हमने अकादमी की प्रस्तुतियों पर कोई आंच नहीं आने दी, उसकी शान को कभी धूमिल नहीं होने दिया। जुगल अपनी स्टाईल में बिना बताये और बिना किसी से सेवा कराये, चुपके से बहुत दूर चले गए। 

तरुण राज ने कहा - जो रोज़ मिलते हैं, वो दिल में समा जाते हैं। पिछले हफ़ते ही जुगल ने कहा था, बहुत साल हो चुके हैं अब बैठकें नहीं होतीं। इस सिलसिले को फिर से क़ायम किया जाये। 

सुप्रसिद्ध वरिष्ठ रंगकर्मी वेदा राकेश ने कहा - बहुत पुराना साथ है जुगल से। उन दिनों रंगमंच के काम से जब भी कहीं जाना होता था तो जुगल अपनी साईकिल लिये हाज़िर मिलते। वो हीरो हुआ करते हम लोगों के। बहुत चंचल और शैतान थे। अपने साथियों का बहुत ख्याल रखते थे वो। यह गुण उनकी आदतों में शामिल थे। मैं उनकी मुस्कान, उसके खुशनुमा चेहरे और बोलती आंखों को याद करते रहना चाहूंगी। 

वरिष्ठ रंगकर्मी मृदुला भारद्वाज ने कहा - मुश्किल ही नहीं बहुत मुश्किल है जुगल के बारे में बात करना। वो बहुत अच्छा नहीं, बहुत ख़राब एक्टर था। बिना बताये चला गया। जिस तरीके से गया, वो तो बहुत ही ख़राब था। गज़ब का परफेक्शनिस्ट एक्टर था वो। अपने से बहुत प्यार करता था। शायद इसलिये भी बहुत अच्छा एक्टर था। जितनी देर काम करता था अपने पर बहुत ध्यान देता रहा। हर एक्ट के बाद पूछता था, कैसा रहा? हमें जब भी किसी कार्यक्रम में जाना होता था तो जुगल को फ़ोन करते थे कि पहुंच रहे हो न। लेकिन आज तो उसी की याद में आना था। कोई फ़ोन नहीं कर पाये। 

वरिष्ठ रंगकर्मी प्रदीप घोष ने बताया - मैं पिछले ४० साल से जानता था जुगल को। बंदे में बहुत दम था। उसकी सोच बहुत बड़ी थी। मैंने उसे बहुत अच्छी एक्टिंग करते हुए देखा है। बहुत कम होते ऐसे एक्टर। 

युवा रंगकर्मी और समाजसेवी दीपक कबीर ने बताया - बहुत कुछ सीखा है मैंने जुगलजी से। नाटक को लेकर बहुत चिंतित देखा है उनको। सेलेब्रटी होने के बावजूद उनमें ईगो नहीं था। कहीं भी बैठ जाते। सादगी की मिसाल थे वो। सामजिक कार्यकर्ता भी थे वो। इसीलिए कार्यक्रमों में उनको अक्सर बुलाया जाता था। लेकिन वो बोलने के इच्छुक कतई नहीं रहे। एक दिन बोले, आजकल हम कंडोलेंस बहुत करते हैं। क्या यही करते रहेंगे ज़िंदगी भर? 

सुप्रसिद्ध वरिष्ठ रंगकर्मी पुनीत अस्थाना ने बताया - जुगल बहुत पुराने साथी थे उनके। ज़बरदस्त पोटेंशियल था उनमें। जब पहली बार देखा तो हम तभी समझ गए थे कि लंबी रेस का घोड़ा हैं जुगल। परकाया में घुस कर एक्टिंग करते थे वो। वो अक्सर कहा करते थे कि लोग एक्टिंग करना चाहते हैं, पढ़ना नहीं चाहते हैं। मैंने उनके हाथ में हमेशा कोई न कोई किताब देखी। वो किसी भी विषय से संबंधित होती थी। उनकी टाईमिंग गज़ब की थी, लेकिन यह आख़िरी वाली टाईमिंग बिलकुल पसंद नहीं आई। 

वरिष्ठ रंगकर्मी गोपाल सिन्हा ने बताया - जुगल अक्सर फ़ोन करते थे। बहुत लंबी लंबी बातें होती थीं। साथ-साथ उठना-बैठना बहुत रहा। लेकिन हमने नाटक साथ-साथ नहीं किया था। एक दिन फ़ोन आया कि एक रोल है। मैं सकुचाया। जुगल ज़बरदस्त ही एक्टर ही नहीं, प्रशिक्षक भी थे। मेरी अपनी सीमायें थीं। डर लगाकि मैं उन्हें संतुष्ट नहीं करा पाया तो? खुद को जुगल के सामने एक्सपोज़ नहीं करना चाहता था। लेकिन जुगल ने मुझे सहज कर दिया। पिछले दो-तीन महीने से मैं जुगल के संपर्क में नहीं था। मुझे इसका ताउम्र मलाल रहेगा। 

सुप्रसिद्ध रंगकर्मी चित्रा मोहन ने कहा - जुगल की ढेर यादें हैं। जब वो अंदर ही अंदर बहुत भर जाते थे तो एकदम से फट पड़ते थे। घंटा-डेढ़ घंटा लगातार बोलते रहते। ऐसी-वैसी ढेर बातें कर जाते। बहुत पसेज़िव थे वो। मंच पर हमेशा सही वक्त पर एंट्री और एग्ज़िट करते थे। लेकिन ज़िंदगी के मंच पर रांग एग्ज़िट कर गए।
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२८-१०-२०१५

जुगलकिशोर : वो ज़िन्दादिली, वो शरारत भरी मुस्कान

-पुंज प्रकाश
ल रात तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही थी तो मैं जल्दी सो गया था. सुबह – सुबह तड़के आँख खुलते ही नेट ऑन करके फेसबुक, वाट्सअप आदि के मैसेज चेक करना अब हम जैसे लोगों की आदतों में शुमार है. जैसे ही नेट ऑन किया तो वेदा राकेश जी का मैसेज वाट्सअप पर पड़ा था - V sad news…Jugal passed away. मैसेज 11.24 बजे रात्रि का था. मैं अभी ठीक से जगा भी नहीं था. मैंने जवाब में केवल व्हाट लिखा. सच कहूँ तो इस खबर पर यकीन नहीं किया जा सकता है. मैंने फ़ौरन वेदा जी को फोन लगाया. राकेश जी ने फोन उठाया. हमेशा बुलंद आवाज़ में बात करनेवाले राकेश जी के स्वर में बेहद उदासी थी. उन्होंने बस इतना ही कहा कि बड़ा ही विकट समय है, एक एक करके सारे अच्छे लोग हमें छोड़कर जा रहे हैं. मेरी और राकेश जी दोनों ही के समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि इस वक्त और क्या बात की जा सकती है. सच है कि कभी – कभी शब्द बड़े ही बौने हो जाते हैं और मौन मुखर.

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल में बतौर कलाकार मेरे साथ भारतेंदु नाट्य अकादमी के कुछ पूर्व विद्यार्थी भी कार्यरत थे. उनके मुंह से जुगल सर के किस्से बहुत सुने थे. हालांकि सुनी सुनाई बातों पर किसी भी व्यक्ति के बारे में कोई अवधारणा बनाना उचित नहीं लेकिन इतना तो समझ में आ ही गया था कि एक खुशमिजाज और जिंदादिल इंसान की कथा है. फिर पीपली लाइव नामक फिल्म देखी तो इनके चहरे से भी रु-ब-रु होने का अवसर प्राप्त हुआ. चेहरे पर लखनवी पानी और नमक की चमक साफ़ - साफ़ देखी जा सकती थी. साथ ही साथ यह भी अंदाज़ा हो गया कि वो निश्चित ही एक बेहतरीन अभिनेता हैं.

फरवरी 2015 को युगल सर से मुलाकात हुई इप्टा के डोंगरगढ़ (छत्तीसगढ़) इकाई द्वारा आयोजित 10 वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह में. रामलीला नाटक के लेखक राकेश जी, निर्देशिका वेदा राकेश जी के साथ युगल सर भी इस आयोजन में मुख्य अतिथि के बतौर आमंत्रित थे. चाय पीते – पीते पता नहीं कब गप्पों का सिलसिला शुरू हो गया. अजनबी जैसा कुछ लग ही नहीं रहा था. अपने एकांतप्रिय स्वभाव के कारण मैं पहले थोड़ा असहज ज़रूर था किन्तु फ़ौरन ही यह असहजता कब और कैसे गायब हो गई, पता ही नहीं चला. फिर क्या था हम तीन दिनों तक जमके बातें करते रहे. दुनियां जहान के किस्से, मज़ाक. सकारात्मक सोच के इन तीनों इंसानों को सुनना ही मेरे मन में उर्जा का संचार कर रहा था. हम साथ – साथ नाश्ता करते, चाय पीते, खाना खाते, नाटक देखते, अतिथि की कुर्सी पर बैठते, घूमते – टहलते और खूब सारी गप्पें मारते.

एक शाम हम नाटक देखने पहुंचे. साउंड चेक करने के लिए ऑपरेटर कबीर का एक गीत “मन लागो यार फकीरी में” बजा रहा था. युगल सर और मैं दोनों सुकून भरा यह गायन सुनने लगे. युगल सर ने पूछा – किसने गाया है. मैंने कहा – सर मुझे पता नहीं. जुगल सर बोले – बड़ा सुकून से गया है. गीत खत्म हुआ तो युगल सर उठकर ऑपरेटर के पास गए और उससे दुबारा यह गीत बजाने का अनुरोध करते हुए पूछा कि यह गीत किसने गाया है. ऑपरेटर ने कहा – मुझे पता नहीं. फिर युगल सर ने कहा - उन्हें यह गीत मिल सकता है क्या? ऑपरेटर ने कहा - पेन ड्राइव या स्मार्ट फोन है तो ले लीजिए. युगल सर के पास यह दोनों नहीं था. मैंने कहा – सर मैं ले लेता हूँ फिर आपको भेज दूँगा. युगल सर ने कहा – ठीक है. बाद में मैंने उस ऑपरेटर से यह और एक और गीत लिया – “पत्ता बोला बृक्ष से.” ले लिया. मैं जब गीत अपने मोबाईल में ट्रांसफर कर रहा था तो पता चला कि यह शुजात हुसैन  ने गाया है. लेकिन अफ़सोस आजतक यह गीत मेरे ही पास हैं.

तीन दिन साथ रहने के पश्चात् हम विदा हो गए. युगल सर को जब भी मौका मिलता फोन लगा देते और फिर हम गप्पें मारने में व्यस्त हो जाते. अभी पिछले दिनों वो अपना नाटक “बेयरफुट इन एथेंस” (निर्देशक – राज बिसारिया) लेकर पटना आए हुए थे. लेकिन अफ़सोस कि मुझे उसी दिन पटना से रांची के लिए गाड़ी पकड़ना था. उन्हें मंच पर अभिनय करते हुए देखने की तमन्ना अधूरी ही राह गई. बहरहाल, कितनी बातों का अफ़सोस किया जाय. हां यह शिकायत ज़रूर रहेगी कि रंगमंच और समाज में जिंदादिल लोग अब बहुत ही कम बचे हैं. जिससे भी मिलो हाय पैसा, हाय पैसा करता रहता है. ऐसे समय में युगल सर का हमसे जुदा होना कही से भी सही और तर्क संगत नहीं है. यह भी कोई उम्र थी? इस उम्र में ही तो अभिनेता का अभिनय जवान होता है. अब तो बस यही उम्मीद है कि जुगल सर की जिंदादिली और शरारत भरी मुस्कान हम जैसे को सही राह दिखाए. अलविदा सर नहीं कहूँगा क्योंकि आप हम जैसे पता नहीं कितने शिष्यों के ह्रदय में धड़कन बनके धड़क रहे हैं और धड़कते रहेंगें.

लेखक के ब्लाग से साभार ( जुगलकिशोर जी अपना नाम युगलकिशोर भी लिखते थे -संपादक)।

Monday, October 26, 2015

अलविदा जुगल किशोर !!!

- वीर विनोद छाबड़ा 

अभी थोड़ी देर पहले ही लौटा हूं मित्र जुगल किशोर का विदा करके। जुगल मेरे ही नहीं लखनऊ के हर रंगकर्मी के मित्र थे। साहित्य प्रेमियों के मित्र थे। समाज कर्मियों के मित्र थे।जुगल किसी परिचय के मोहताज़ कभी नहीं रहे। उनका बोलता और हंसता हुआ चेहरा ही पर्याप्त होता था। कल शाम तक वो भले-चंगे थे। अचानक ही सीने में दर्द उठा। परिवारजन अस्पताल ले जा रहे थे कि रास्ते में ही.…

जुगुल किशोर से मेरी पहली मुलाक़ात कई साल पहले आकाशवाणी लखनऊ में हुई। मैं वहां बच्चों के कार्यक्रम में कहानी पाठ के लिए जाता था। कार्यक्रम संचालन में कई बार सुषमा श्रीवास्तव 'दीदी' के साथ जुगल 'भैया' जुगलबंदी करते होते थे। जुगल की मौजूदगी से राहत मिलती थी। उन दिनों प्रसारण लाइव होता था। कई बार कहानी पढ़ते-पढ़ते मैं कहीं अटक जाता या असहज हो जाता था तो जुगल भैया तुरंत कुछ न कुछ बोल कर संभाल लेते थे। 

आगे चले कर अनेक अवसरों पर स्टेज पर और स्टेज के पीछे देखा इनको। बहुत अच्छे अभिनेता ही नहीं बड़े दिल वाले थे। और प्रशिक्षक भी थे। भारतेंदु नाट्य अकादमी में प्रशिक्षक के रूप में कई साल तक रहे। इसके निदेशक का भी काम अरसे तक देखा। पिता, अंधा युग, राज, ताशों के देश में, जूलियस सीज़र, कंजूस, अंधेरे में, वासांसि जीर्णानि, बालकल विमन आदि दर्जनों नाटकों में काम किया। लखनऊ रंगमच ही नहीं दूसरे प्रदेशों में भी उन्होंने अपने अभिनय की छाप छोड़ी। उन्हें परफेक्शनिस्ट कहा जाता था। 


एक दिन मैंने उन्हें 'पीपली लाईव' में देखा। उसमें मुख्य मंत्री की भूमिका की थी उन्होंने। उन्होंने बताया था दबंग-२ में भी काम किया है। जब कभी मैं उन्हें देखता मुझे बड़ा गर्व होता था। अपने शहर लखनऊ के होनहार हैं। राजपाल यादव और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी जैसे फ़िल्म आर्टिस्टों को भी अभिनय के गुर सिखाये।
साहित्यिक गोष्ठियों में वो जाना-माना चेहरा थे। सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति रहे। इप्टा के साथ साथ सांप्रदायिकता के विरुद्ध लड़ते रहे। 


लखनऊ मंच से उनका जाना बहुत बड़ा सदमा है। भारतेंदु नाट्य अकादमी और फिर गुलाला घाट पर उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए रंगकर्मियों, साहित्यकारों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की जुटी भारी भीड़ इसका प्रमाण है। हर व्यक्ति व्यथित और शोक में डूबा हुआ। सबके पास उनका कोई न कोई यादगार लम्हा था। सबके पास कुछ न कुछ सुनाने को संस्मरण थे। शब्दों की कमी पड़ रही थी। महज़ ६१ साल के थे जुगल। यह भी जाने की कोई उम्र होती है। 


मैं जब भी उन्हें देखता मेरा मोबाईल कैमरा उनकी और देख कर बोलता था - शॉट प्लीज़। कई बार उन्हें सोच में डूबे देखा, किसी दृश्य को विसुलाईज़ करते हुए या किसी किरदार की काया में प्रवेश करने की कवायद करते हुए या पूरी तन्मयता से सुनते हुए। मैंने बिना बताये ही शॉट ले लिया। एक आध बार ध्यान भंग हुआ उनका। मुझे देख वो चौंके। फिर मुस्कुरा दिए। कमाल के अदाकार। 

सोचा, एक दिन उनसे कहूंगा - आपका चेहरा बहुत अच्छा है। एक दिन फोटो सेशन हो जाए। लेकिन अरमान दिल में रह गये। मुझे नहीं मालूम था कि एक दिन उनकी विदाई का शॉट भी लेना पड़ेगा। 
अलविदा जुगल जी। आपका जिस्म नहीं होगा। शो तो चलता ही रहेगा। लेकिन यह भी सच है कि रंगमंच पहले जैसा नहीं रहेगा। साहित्यिक गोष्ठियों में आपकी कमी बहुत खलेगी। 

२६-१०-२०१५

Tuesday, October 20, 2015

विवेचना जबलपुर का 22 वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह 28 अक्टूबर से

विवेचना थियेटर ग्रुप का बाइसवां राष्ट्रीय नाट्य समारोह आगामी 28 अक्टूबर से 01 नवंबर 2015 तक तरंग प्रेक्षागृह में आयोजित है। विवेचना का यह समारोह केन्द्रीय क्रीड़ा व कला परिषद एम पी पावर मैनेजमेंट कंपनी लि के साथ संयुक्त रूप से आयोजित है। इस समारोह में अलग अलग रंग के नाटक मंचित होने जा रहे हैं। हर नाटक की अपनी एक विशिष्टता है जिसके कारण ये नाटक इस समय भारत के सर्वाधिक चर्चित नाटकों में से एक हैं। 

विवेचना ने राष्ट्रीय नाट्य समारोह की शुरूआत सन् 1994 से की थी। तबसे अब तक हर वर्ष आयोजित नाट्य समारोहों प्रसिद्ध निर्देशकों, कलाकारों और नाट्य संस्थाओं ने जबलपुर में अपने मंचन किए हैं। विवेचना थियेटर ग्रुप के नाट्य समारोह की अपनी प्रतिष्ठा है। समारोह का हर नाटक किसी खासियत के साथ ही होता है और दर्शकों को विवेचना के नाट्य समारोह का इंतजार रहता है। 

हले दिन 28 अक्टॅूबर को आयोजक संस्था विवेचना थियेटर ग्रुप के नाटक ’मौसा जी जैहिन्द ’ का मंचन होगा। यह नाटक उदयप्रकाश की इसी नाम की कहानी पर आधारित है। इसका लेखन व निर्देशन वसंत काशीकर ने किया है। इसमें प्रमुख भूमिका भी वसंत काशीकर ने निबाही है। इस नाटक के मंचन अब देश भर में हो रहे हैं। फिलहाल यह नाटक एन एस डी के पूर्वात्तर क्षेत्रीय फेस्टीवल में सिक्किम, अगरतला, जोरहाट और मेघालय के तूरा में मंचित हो रहा है। 

मारोह का दूसरा नाटक दिल्ली की संस्था स्पर्श नाट्यरंग द्वारा अजित चौधरी के निर्देशन में मंचित होगा। ’पति गये री काठियावाड़’ नामक यह नाटक सुप्रसिद्ध मराठी लेखक वेंकटेश माडगूलकर का लिखा हुआ है जिसका हिन्दी अनुवाद सुधीर कुलकर्णी ने किया है। यह सहज और निर्दोष हास्य का नाटक है। इसके दिल्ली सहित देश के विभिन्न शहरों में मंचन बहुत सराहे गये हैं। 

तीसरे दिन रवि तनेजा के निर्देशन में कॉलेजिएट डामा सोसायटी दिल्ली द्वारा जगदीश चन्द्र माथुर के ऐतिहासिक नाटक ’कोणार्क’ का मंचन किया जाएगा। कोणार्क के ध्वस्त मंदिर की कथा इस नाटक में एक अलग दृष्टिकोण से दर्शाई गई है। इसमें सैट, लाइट और अभिनय सभी बहुत भव्य है। 

चौथे दिन आज के समय का सर्वाधिक प्रशंसित नाटक ’बेयरफुट इन एथेंस’ का मंचन लखनऊ के कलाकार करेंगे। नाटक का निर्देशन वरिष्ठ रंगनिर्देशक राज बिसारिया जी ने किया है। इस नाटक के मंचन देश और विदेश में बहुत सराहे गए हैं। इस नाटक को पिछले 10 वर्षों का सर्वश्रेष्ठ नाटक माना जाता है। यह नाटक सुकरात को मौत की सजा दिये जाने के पहले चलाए गए मुकदमे पर आधारित है। आज के समय के सबसे बड़े मुद्दे प्रजातंत्र पर बहस करता है। 

पांचवें और अंतिम दिन व्रात्य बसु का नाटक ’चतुष्कोण’ मंचित होगा। इसका निर्देशन प्रो सुरेश भारद्वाज ने किया है। यह रहस्य रोमांच से भरा नाटक है। बहुत समय बाद हिन्दी में इस विषय को छूता हुआ नाटक आया है। इस नाटक के मंचन बहुत पसंद किए जा रहे हैं। एक पति, पत्नी व दो अन्य पुरूषों के बीच की यह कहानी बहुत रोचक है। 

विवेचना ने यह समारोह केन्द्रीय क्रीड़ा व कला परिषद एम पी पावर मैनेजमेंट कंपनी लि के साथ संयुक्त रूप से आयोजित किया है। प्रतिदिन संध्या 7.30 बजे से तरंग ऑडीटोरियम में नाटक मंचित होंगे। विवेचना ने सभी नाट्यप्रेमियों से नाटकों का आनंद लेने का अनुरोध किया है। इस हेतु हिमांशु राय 9425387580, बांकेबिहारी ब्यौहार 9827215749 वसंत काशीकर 9425359290 से संपर्क किया जा सकता है।

हिमांशु राय
सचिव विवेचना

Manufacturing the Protest

-Ranbir Sinh
Mr Jaitly, the Finance Minister is a honourable man. He should know it very well that writers do not manufacture protest or raise controversy. They create  literature  from the inner depths of their hearts. With deep emotions and strict commitment. Probably he mistook that literature is some kind of an item which is or should be “made in India” with the help of business tycoons. He is a honourable man, and rightly as a Finance Minister he should think that way. 

A man who bisects the body of the human being, rightly thinks that the writers do write with a knife and not a pen. It is not their fault as the birds of their flock are not intellectuals or creative artists.

Sir, there is a difference between our ideology and yours. Our ideology is that we invite all good thoughts to come from all directions. We accept them and imbibe them. You have blinkers on and cannot see beyond your nose. It is because of this that I rarely see a smile on your face. There is a perpetual grimness of arrogance on your face. Neither you respect the thoughts of others nor you accept them. I must admit that I have been a Nehruvian right from college days. We are uncomfortable because your men have openly threatened that if we do not tread upon your way then we will have die a dog’s death. Sir you are an honourable man, would you like us to die a dog’s death. We are against this dispensation. Wise men do not defend their mistakes. They have the courage to accept it. This is the greatness which is bestowed upon very few. You are very right, We did not protest when Babri Masjid was demolished. We did not protest when Gujrat massacre took place in 2002.We are protesting now because all the killings of writers and intellectuals is being done in a planned manner under the agenda of
your mentor, RSS. Even your political partner has said that they admired Modi because of Godhara. 

Sir your are an honourable man and will understand that we cannot admire Modi because of that. We will greatly appreciate if you, Modi and the chief of RSS would call the Ministers,M.P.s M.L.As and others and take them to task and tell them to keep their mouth shut. We need peaceful existence of all communities. Our Ganga Jamani culture is the strongest foundation.


Mob:9829294707;Email:ranbirsinh@rediffmail.com.

Friday, October 16, 2015

दरवाजे तक आए फासीवाद को चुनौती

-भाषा सिंह
ब तक 25 से अधिक साहित्यकार साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा चुके हैं, संगीत-नाटक अकादमी को भी पुरस्कार वापस करने की शुरुआत हो गई है। आने वाले दिनों में इस विद्रोही ब्रिगेड में चित्रकारों-गायकों, नर्तकों के शामिल होने की उम्मीद जताई जा रही है। कन्नड़ विचारक एमएम कलबुर्गी की हत्या के विरोध में हिंदी लेखक उदय प्रकाश द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का सिलसिला भारतीय साहित्य में बड़े बवंडर का रूप लेता जा रहा है। 

अपने पुरस्कार लौटाकर इन साहित्यकारों ने, 'अपने दरवाजे तक आए, सांप्रदायिक फासीवाद को चुनौती दी है।’ केंद्र में मोदी सरकार के बाद से देश-भर में जो माहौल बना, उसके खिलाफ लेखकों का खुला विक्षोभ पत्र है, जिसपर हस्ताक्षर करने वालों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। पंजाब की मशहूर लेखिका दलीप कौर टिवाणा ने बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ पद्मश्री पुरस्कार लौटा दिया है। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लेखक सलमान रुश्दी ने साहित्यकारों के इस मुखर आक्रोश का समर्थन किया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी गूंज हुई। संस्कृति की दुनिया के ये सम्मानित महारथी, सीधे-सीधे राजनीतिक सवाल उठा रहे हैं। 'नफरत की राजनीति, असहिष्णुता, सांप्रदायिकता, फासीवाद’ के खिलाफ तमाम रचनाकारों, संस्कृतिकर्मियों ने जिस तरह सुर में सुर मिलाया है, वह आने वाले दिनों में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ बुद्धिजीवी तबके की हुंकार का रूप ले सकती है। इतनी बड़ी संख्‍या में कलम और आवाज के वरिष्ठ और युवा सिपाहियों द्वारा देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर हो रहे हमलों, धार्मिक विद्वेष फैलाने वाली शक्तियों को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा प्रश्रय देने और कन्नड़ विचारक-लेखक एम.एम. कलबुर्गी की हिंदुत्ववादी ताकतों द्वारा हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी के नहीं खड़े होने पर आवाज उठाने का बड़े राजनीतिक-सामाजिक फलक पर असर पडऩा अवश्यंभावी है। 

साहित्य अकादमी के पुरस्कारों को वापस करने का सिलसिला जारी है। साहित्य अकादमी के अलावा राज्य सरकारों के पुरस्कारों को भी लेखक वापस कर रहे हैं। दूसरी विधाओं के संस्कृतिकर्मियों से भी अपील की जा रही है। इस महत्वपूर्ण परिघटना पर केंद्र सरकार का रुख इतना शर्मनाक है कि उससे आने वाले दिनों में विरोध में खड़े संस्कृतिकर्मियों की जमात और बढऩे वाली है। देश के संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने बेहद अहंकार से कहा, 'अगर लेखक कह रहे हैं कि उनके लिए लिखना मुश्किल हो रहा है तो पहले वे लिखना बंद करें, फिर हम देखेंगे। ये पुरस्कार लेखकों को लेखकों द्वारा दिए गए थे, इसे अगर वे लौटाना चाहते हैं तो इससे सरकार का कोई लेना-देना नहीं है। पुरस्कार लौटाना उनका निजी फैसला है, हमें यह स्वीकार्य है।’ इस तरह केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अपनी तरफ से एलान कर दिया है कि वह उस दिन का इंतजार कर रही है, जब लेखक लिखना बंद कर दें। गौरतलब है महेश शर्मा ही वह मंत्री हैं जिन्होंने दादरी में गोमांस खाने की अफवाह पर अखलाक की हत्या को क्रिया की प्रतिक्रिया बताया था और हत्यारी भीड़ का पक्ष लेते हुए बयान दिया था कि इस भीड़ ने अखलाक की जवान बेटी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था। इससे पहले संस्कृति मंत्री कह चुके थे कि उनके मंत्रालय के तहत आठ संस्थाएं आती हैं और इनका शुद्धीकरण जरूरी है। साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी ने पुरस्कार लौटाने वालों पर तीखी टिप्पणी की, जिससे लेखक समुदाय और अधिक क्षुब्‍ध हो गया। अंग्रेजी की मशहूर लेखिका नयनतारा सहगल ने जब पुरस्कार लौटाया तो उस पर विश्वनाथ तिवारी का कहना था कि सहगल की पुरस्कृत किताब को अकादमी ने कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद कराया था। इससे उन्हें बहुत कमाई हुई। अब वह पुरस्कार राशि लौटा सकती हैं लेकिन उन्हें जो साख अकादमी के पुरस्कार से मिली, उसका क्या। इस पर नयनतारा सहगल ने करारा जवाब दिया कि पुरस्कार उनके लिए सम्मान था लेकिन उन्हें बतौर लेखक साख पहले मिल चुकी थी। उन्होंने और अशोक वाजपेयी ने अकादमी को पुरस्कार लौटाने के साथ-साथ एक लाख रुपये का चेक भी लौटाया है। मलयालम और अंग्रेजी भाषा के कवि के. सच्चिदानंदन और उपन्यासकार शशि देशपांडे ने साहित्य अकादमी से रिश्ता तोड़ लिया है। उनका मानना है, 'अकादमी को इस संकट के दौर में जब साहित्यकारों के साथ खड़ा होना चाहिए, तब वह सत्ता के साथ खड़ी है। लेखकों की संस्था लेखकों का अपमान करने पर उतारू है, उनसे पुरस्कार राशि वापस मांगना कितना शर्मनाक है।’ 

जो भी लेखक-साहित्यकार पुरस्कार लौटा रहे हैं, वे खुलकर अपनी असहमति भी दर्ज करा रहे हैं। जिन साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेताओं ने अभी तक पुरस्कार नहीं लौटाए हैं, उनकी घेराबंदी अलग-अलग अंदाज में हो रही है। उनसे पूछा जा रहा है, आपकी पॉलिटिक्स क्या है या फिर कहा जा रहा है, तय करो किस ओर हो तुम। फेसबुक सहित बाकी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इस तरह की पोस्ट की भरमार है। लेखक-रचनाकार-रंगकर्मी भी अपने पुरस्कार लौटाने की घोषणा पहले इन साइट्स पर ही कर रहे हैं। इस तरह का स्वत:स्फूर्त असंतोष पहली बार देश भर में लेखकों, साहित्यकारों और रंगकर्मियों में देखने को मिल रहा है। युवा साहित्यकारों में अमन सेठी ने अपना पुरस्कार वापस दिया है। वही मृत्युंजय प्रभाकर ने साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अपनी पहली कविता पुस्तक वापस लेने की घोषणा की है। 

पुरस्कार और साहित्य अकादमी की फेलोशिप लौटाने की घोषणा करने वाली वरिष्ठ और बेबाक-निडर अंदाज के लिए मशहूर लेखिका कृष्णा सोबती ने बताया, 'बहुत ही खराब दौर है देश में। हमें बोलना ही होगा। बाबरी और दादरी को दोबारा यह देश नहीं झेल सकता। अब नहीं बोले, तब फिर कब बोंलेंगे।’ वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने राजेश जोशी के साथ साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया। मंगलेश डबराल ने आउटलुक को बताया, 'देश भर से लेखकों का इतनी बड़ी संख्या में पुरस्कार लौटाना यह बताता है कि लेखक कितनी घुटन में जी रहे हैं। लेखकों की दुनिया में पहली बार ऐसा हो रहा है। ऐसा नहीं कि इससे पहले दमन-उत्पीड़न की घटनाएं नहीं हुई हैं। अब गुणात्मक रूप से इन दमनकारी घटनाओं की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। चारों तरफ से घेराबंदी है। किसी भी तरह लोगों को खामोश करने की साजिशों को राजनीतिक प्रश्रय मिला हुआ है। ऐसे में लेखक जो कर सकता है, वही वह कर रहा है। आज जब सांप्रदायिक फासीवाद हमारे दरवाजे तक आ गया है, हम सबको बोलना होगा। ऐसा नहीं है कि इससे फर्क नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है और आने वाले दिनों में इसकी गूंज और बढ़ेगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हमारी आवाजें पहुंचेगी और भारत की असल स्थिति सामने आएगी। भारतीय लेखकों-साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों के लिए यह ऐतिहासिक मुकाम साबित होगा।’

यह बात सही दिखाई दे रही है। अलग-अलग भाषाओं के लेखकों में जबर्दस्त हलचल है। पंजाबी के 11 लेखक पुरस्कार लौटा चुके हैं। इसमें पंजाबी के लोकप्रिय कवि सुरजीत पातर भी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि इस विविधापूर्ण देश में लेखकों-विचारकों और विद्वानों की हत्या कष्ट दे रही है। इससे भी ज्यादा कष्ट इस बात का है कि ये हत्यारे खुले घूम रहे हैं या फिर भ्रष्ट नेताओं से संरक्षण पा रहे हैं। इसी तरह के आक्रोश के साथ कवि जसविंदर और दर्शन भुल्लर, उपन्यासकार बलदेव सिंह सादकनामा और अनुवादक चमनलाल ने अपने पुरस्कार अकादमी को लौटाए हैं। इसी क्रम में बच्चों के लेखक हरदेव चौहान ने एनसीईआरटी द्वारा उन्हें दिए गए राष्ट्रीय पुरस्कार को लौटा दिया है।

इस शासन के खिलाफ बेचैनी किस कदर तारी है कि वरिष्ठ और युवा संस्कृतिकर्मी अपना नाम विरोध करने वालों की सूची में दर्ज कराना चाहते हैं। अभी तक इस सूची में पहली रंगकर्मी शामिल हुईं माया कृष्णाराव। उन्होंने संगीत-नाटक अकादमी को पुरस्कार लौटाते हुए कहा कि जिस तरह की फासीवादी संस्कृति केंद्र और राज्य सरकारें फैला रही हैं, उसका विरोध जरूरी है। वैसे विरोध के इस तरीके के खिलाफ भी लेखकों ने बोलना शुरू कर दिया है। इसमें अभी तक सबसे बड़ा नाम है वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह। वामपंथी लेखक संगठन से संबद्ध नामवर सिंह ने खुलकर कहा कि अखबारों में नाम के लिए लेखक पुरस्कार लौटा रहे हैं। इन लेखकों को साहित्य अकादमी पर निशाना नहीं साधना चाहिए था क्योंकि यह लेखकों की निर्वाचित संस्था है। इस तरह लेखकों का एक तबका जो नामवर सिंह से पुरस्कार की वापसी की मांग कर रहा था, उसे नामवर ने जवाब दिया। ऐसा नहीं कि नामवर ने ऐसा पहली बार किया। इससे पहले चाहे वह छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के साथ मंच शेयर करने की बात हो या फिर केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के साथ मंच पर रहने का मुद्दा रहा हो वह हर बार सवालों में घिरे रहे। उनकी इस प्रतिक्रिया पर मुस्लिम सवालों पर मुखर लेखिका शीबा असलम फहमी ने टिप्पणी की, 'इससे नामवर सिंह की प्रतिबद्धता सामने आती है।’ 

देश में कश्मीर से लेकर केरल तक के रचनाकार बढ़ती 'फासीवादी’ संस्कृति के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं। कश्मीरी लेखक गुलाम नबी ख्याल ने पुरस्कार लौटाया तो केरल की प्रसिद्ध लेखिका सारा जोसेफ ने भी लौटाया। कन्नड़ लेखक और अनुवादक डी.एन. श्रीनाथ, कन्नड अनुवादक जी. एन. रंगानाथ राव ने साहित्य अकादमी लौटाया। गुजरात के कवि अनिल जोशी, लेखक गणेश देवी ने बिगड़ते सांप्रदायिक माहौल के विरोध में इस्तीफा दिया। कर्नाटक के लेखकों ने साहित्य अकादमी के साथ-साथ राज्य अकादमी के पुरस्कारों को लौटाने का फैसला किया है। 

खबर लिखे जाने तक तीनों लेखक संगठनों-प्रलेस, जलेस और जसम ने अपनी तरफ से लेखकों से साहित्य अकादमी के पुरस्कार वापस करने की कोई अपील तो नहीं की थी। लकिन इन तीनों संगठनों ने साहित्य अकादमी के रवैये के खिलाफ प्रदर्शन करने का फैसला जरूर किया है। इस क्रम में इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) ने अपील जारी करके तमाम कलाकारों से कहा कि वे अपने पुरस्कार लौटा दें। इप्टा के अध्यक्ष रनबीर सिंह ने कहा, 'नर्तकों, संगीतकारों, नाटककारों, निदेशकों, कलाकारों, चित्रकारों को अपने पुरस्कार अभिव्यक्ति की आजादी की मुहिम के समर्थन में लौटा देने चाहिए। सभी को अकादमी के पदों से भी इस्तीफा दे देना चाहिए।’ रनबीर सिंह ने बताया, 'अभिव्यक्ति की आजादी सिर्फ शब्दों से नहीं होती। इसका ताल्लुक तमाम तरह के रचनात्मक रूपों से होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के संकीर्ण और तानाशाही भरे रवैये के विरोध में उठ रही आवाजों को और अधिक मजबूत करने की कोशिश होनी चाहिए।’ कश्मीरी विद्वानों के संगठन अदीबी मरकज कमराज ने भी पुरस्कार लौटाने वाले साहित्यकारों का समर्थन किया है। इस संगठन ने मांग की है कि साहित्य अकादमी को देश भर में चल रहे सांप्रदायिक उन्माद और लेखकों की हत्याओं के खिलाफ अपनी चुप्पी को तोड़ना चाहिए। अब विरोध में संगठित आवाजें भी उठ रही हैं। कोंकणी भाषा के 15-20 साहित्यकार अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की तैयारी में हैं। ये लेखक गोवा कोंकणी लेखक संघ से संबद्ध है। इस बारे में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने वाले कोंकणी लेखक एन.शिवदास ने बताया, 'हम चार-पांच लोग करीब 15-20 लेखकों से संपर्क में हैं और हम विरोध में अपनी आवाज बुलंद करेंगे। गोवा लेखकों के लिए सुरक्षित जगह नहीं है, हमें भी यहां धमकियां मिलती रहती हैं।’

ऐसा लगता है कि विरोध में उठे ये स्वर अभी थमने वाले नहीं। 'सांस्कृतिक तानाशाही’ की दस्तक के खिलाफ उठी ये आवाजें पब्लिक इंटिलेक्टचुअल की जरूरत को और गहराई से हमारे सामने पेश कर रही हैं। बेचैनी बढ़ रही है लगातार और उसकी अभिव्यक्तियां भी।  

आउटलुक हिंदी से साभार, मूल स्रोत :
http://www.outlookhindi.com/country/issues/historic-decision-authors-rejection-and-resgination-on-rise-4587

आज़ादी और विवेक के हक़ में प्रतिरोध-सभा

प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच, दलित लेखक संघ व साहित्य-संवाद ने  दिल्ली में निम्नलिखित बयान जारी किया : 

देश में लगातार बढ़ती हुई हिंसक असहिष्णुता और कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ पिछले कुछ समय से जारी लेखकों के प्रतिरोध ने एक ऐतिहासिक रूप ले लिया है. 31 अगस्त को प्रोफेसर मल्लेशप्पा मादिवलप्पा कलबुर्गी की हत्या के बाद यह प्रतिरोध अनेक रूपों में प्रकट हुआ है. धरने-प्रदर्शन, विरोध-मार्च और विरोध-सभाएं जारी हैं. इनके अलावा बड़ी संख्या में लेखकों ने साहित्य अकादमी से मिले अपने पुरस्कार विरोधस्वरूप लौटा दिए हैं. कइयों ने अकादमी की कार्यकारिणी से इस्तीफ़ा दिया है. कुछ ने विरोध-पत्र लिखे हैं. कई और लेखकों ने वक्तव्य दे कर और दीगर तरीक़ों से इस प्रतिरोध में शिरकत की है.

दिल्ली में 5 सितम्बर को 35 संगठनों की सम्मिलित कार्रवाई के रूप में प्रो. कलबुर्गी को याद करते हुए जंतर-मंतर पर एक बड़ी प्रतिरोध-सभा हुई थी. इसे ‘विवेक के हक़ में’ / ‘इन डिफेन्स ऑफ़ रैशनैलिटी’ नाम दिया गया था. आयोजन में भागीदार लेखक-संगठनों – प्रलेस, जलेस, जसम, दलेस और साहित्य-संवाद — ने उसी सिलसिले को आगे बढाते हुए 16 सितम्बर को साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को एक ज्ञापन सौंपा जिसमें उनसे यह मांग की गयी थी कि अकादमी प्रो. कलबुर्गी की याद में दिल्ली में शोक-सभा आयोजित करे. विश्वनाथ त्रिपाठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, चंचल चौहान, रेखा अवस्थी, अली जावेद, संजय जोशी और कर्मशील भारती द्वारा अकादमी के अध्यक्ष से मिल कर किये गए इस निवेदन का उत्तर बहुत निराशाजनक था. एक स्वायत्त संस्था के पदाधिकारी सत्ता में बैठे लोगों के खौफ़ को इस रूप में व्यक्त करेंगे और शोक-सभा से साफ़ इनकार कर देंगे, यह अप्रत्याशित तो नहीं, पर अत्यंत दुखद था. अब जबकि अकादमी की इस कायर चुप्पी और केन्द्रीय सत्ता द्वारा हिंसक कट्टरपंथियों को प्रत्यक्ष-परोक्ष तरीके से दिए जा रहे प्रोत्साहन के खिलाफ लेखकों द्वारा पुरस्कार लौटाने से लेकर त्यागपत्र और सार्वजनिक बयान देने जैसी कार्रवाइयां लगातार जारी हैं, यह स्पष्ट हो गया है कि लेखक समाज इन फ़ासीवादी रुझानों के विरोध में एकजुट है. वह उस राजनीतिक वातावरण के ख़िलाफ़ दृढ़ता से अपना मत प्रकट कर रहा है जिसमें बहुसंख्यावाद के नाम पर न केवल वैचारिक असहमति को, बल्कि जीवनशैली की विविधता तक को हिंसा के ज़रिये कुचल देने के इरादों और कार्रवाइयों को ‘सामान्य’ मान लिया गया है.

विरोध की स्वतःस्फूर्तता और व्यापकता से साफ़ ज़ाहिर है कि इस विरोध के पीछे निजी उद्देश्य और साहित्यिक ख़ेमेबाज़ियाँ नहीं हैं, भले ही केन्द्रीय संस्कृति मंत्री ऐसा आभास देने की कोशिश कर रहे हों. इस विरोध के अखिल भारतीय आवेग को देखते हुए मंत्री का यह आरोप भी हास्यस्पद सिद्ध होता है कि विरोध करने वाले सभी लेखक एक ही विचारधारा से प्रेरित हैं, कि वे सरकार को अस्थिर करने की साज़िश में शामिल हैं. सब से दुर्भाग्यपूर्ण है उनका यह कहना कि लेखक लिखना छोड़ दें, फिर देखेंगे. लेखक लिखना छोड़ दें — यही तो दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी के हत्यारे भी चाहते हैं. केंद्र सरकार इन हत्याओं की निंदा नहीं करती, लेकिन प्रतिरोध करने वाले लेखकों की निंदा करने में तत्पर है. इससे यह भी सिद्ध होता है कि मौजूदा राजनीतिक निज़ाम के बारे में लेखकों के संशय निराधार नहीं हैं. ये वही संस्कृति मंत्री हैं, जिन्होंने दादरी की घटना के बाद हत्यारी भीड़ को चरित्र का प्रमाणपत्र इस आधार पर दिया था कि उसने हत्या करते हुए शालीनता बरती थी और एक सत्रह साल की लडकी को छुआ तक नहीं था. लम्बे अंतराल के बाद, स्वयं राष्ट्रपति के हस्तक्षेप करने पर, प्रधानमंत्री ने चुप्पी तोड़ी भी तो उसमें उत्पीड़क और पीड़ित की शिनाख्त नहीं थी. उसमें सबके लिए शांति के उपदेश के सिवा और कुछ न था. सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष बिहार के चुनावों के दौरान लगातार बयान दे रहे हैं कि दादरी के तनाव का असली कारण पुलिस की ‘एकतरफ़ा’ कार्रवाई है. यह सुनियोजित भीड़ द्वारा की गयी हत्या के लिए मृतक को ज़िम्मेदार ठहराने की कोशिश नहीं तो और क्या है!

लेखकों ने बार बार कहा है कि उनका विरोध किसी एक घटना या एक संस्था या एक पार्टी के प्रति नहीं है. उनका विरोध उस राजनीतिक वातावरण से है जिसमें लेखकों को, और अल्पसंख्यकों तथा दलितों समेत समाज के सभी कमज़ोर तबकों को, लगातार धमकियां दी जाती हैं, उन पर हमले किए जाते हैं, उनकी हत्या की जाती है और सत्तातंत्र रहस्यमय चुप्पी साधे बैठा रहता है. कुछ ही समय पहले तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन को इन्हीं परिस्थितियों में विवश हो कर अपनी लेखकीय आत्महत्या की घोषणा करनी पड़ी थी. ऐसे में साहित्य अकादमी जैसी स्वायत्त संस्थाओं की ज़िम्मेदारी है कि वे आगे आयें और नागरिक आज़ादियों के दमन के इस वातावरण के विरुद्ध पहलक़दमी लें. हम लेखक-संगठन लेखकों के इस विरोध अभियान के प्रति अपनी एकजुटता व्यक्त करते हैं. हम साहित्य अकादमी से मांग करते हैं कि वह न केवल इस दुर्भाग्यपूर्ण वातावरण की कठोर निंदा करे, बल्कि उसे बदलने के लिए देश भर के लेखकों के सहयोग से कुछ ठोस पहलकदमियां भी ले.

लेखकों-संस्कृतिकर्मियों के इस विरोध की एकजुटता को अधिक ठोस शक्ल देने के लिए हमने आनेवाली 20 तारीख को ‘आज़ादी और विवेक के हक़ में प्रतिरोध-सभा’ करने का फ़ैसला किया है. प्रतिरोध-सभा उस दिन अपराह्न 3 बजे से प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के सभागार में होगी. 23 तारीख को, जिस दिन साहित्य अकादमी की कार्यकारिणी की बैठक है, हम बड़ी संख्या में श्रीराम सेन्टर, सफ़दर हाशमी मार्ग से रवीन्द्र भवन तक एक मौन जुलूस निकालेंगे और वहाँ बैठक में शामिल होने आये सदस्यों को अपना ज्ञापन सौंपेंगे, ताकि अकादमी की कार्यकारिणी मौजूदा सूरते-हाल पर एक न्यायसंगत नज़रिए और प्रस्ताव के साथ सामने आये.

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (जनवादी लेखक संघ)
अली जावेद (प्रगतिशील लेखक संघ)
अशोक भौमिक (जन संस्कृति मंच)
हीरालाल राजस्थानी (दलित लेखक संघ)
अनीता भारती (साहित्य संवाद)


Wednesday, October 14, 2015

लेखकों , कलाकारों द्वारा पुरस्कार वापसी पर जन संस्कृति मंच का बयान

न संस्कृति मंच उन तमाम साहित्यकारों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों का स्वागत करता है जिन्होंने देश में चल रहे साम्प्रदायिकता के नंगे नाच और उस पर सत्ता-प्रतिष्ठान की आपराधिक चुप्पी के खिलाफ साहित्य अकादमी और संगीत नाटक अकादमी के पुरस्कारों तथा पद्मश्री आदि अलंकरण लौटा दिए हैं. जन संस्कृति मंच साहित्य अकादमी की राष्ट्रीय परिषद् तथा अन्य पदों से इस्तीफा देनेवाले साहित्यकारों को भी बधाई द्देता है जिन्होंने वर्तमान मोदी सरकार के अधीन इस संस्था की कथित 'स्वायत्तता' की हकीकत का पर्दाफ़ाश कर दिया है. जिस संस्था के अध्यक्ष इस कदर लाचार हैं कि प्रो. कलबुर्गी जैसे महान 'साहित्य अकादमी विजेता' लेखक की बर्बर ह्त्या के खिलाफ अगस्त माह से लेकर अबतक न बयान जारी कर पाए हैं और न ही दिल्ली में एक अदद शोक-सभा तक का आयोजन, उस संस्था की 'स्वायत्तता' कितनी रह गयी है? आखिर किस का खौफ उन्हें यह करने से रोक रहा है? के. सच्चिदानंदन द्वारा उनको लिखा पत्र सबकुछ बयान कर देता है, जिसका उत्तर तक देना उन्हें गवारा न हुआ. सितम्बर के पहले हफ्ते में भी विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों के प्रतिनिधि अकादमी के अध्यक्ष से दिल्ली में मिले थे और उनसे आग्रह किया था कि प्रो.कलबुर्गी की शोक-सभा बुलाएं. आज तक उन्होंने कुछ नहीं किया.

भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद् हो या पुणे का फिल्म इंस्टिट्यूट, नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी हो या भारतीय विज्ञान परिषद्, आई.आई.एम और आई.आई.टी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान हों अथवा तमाम केन्द्रीय विश्विद्यालय तथा राष्ट्रीय महत्त्व के ढेरों संस्थान - शायद ही किसी की भी स्वायत्तता नाममात्र को भी साम्प्रदायिक विचारधारा और अधिनायकवाद के आखेट से बच सके. ऐसे में साहित्य अकादमी की स्वायत्तता की दुहाई देकर अकादमी पुरस्कार लौटानेवालों को नसीहत देना सच को पीठ दे देना ही है.
२०१४ के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले मुज़फ्फरनगर में अल्पसंख्यकों के जनसंहार के बाद से लेकर अब तक हत्याओं का निर्बाध सिलसिला जारी है. पैशाचिक उल्लास के साथ हत्यारी टोलियाँ दादरी जिले के एक छोटे से गाँव में गोमांस खाने की अफवाह के बल पर एक निरपराध अधेड़ मुसलमान का क़त्ल करने से लेकर पुणे-धारवाड़-मुंबई-बंगलुरु जैसे महानगरों तक अल्पसंख्यकों, लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आखेट करती घूम रही हैं. बुद्धिजीवियों, कलाकारों, पत्रकारों के नाम पर 'डेथ वारंट' जारी कर रही हैं. घटनाए इतनी हैं कि गिनाना भी मुश्किल है. इनके नुमाइंदे टी.वी. कार्यक्रमों में प्रतिपक्षी विचार रखनेवालों को बोलने नहीं दे रहे, खुलेआम धमकियां और गालियाँ दे रहे हैं. सोशल मीडिया पर इनके समर्थक किसी भी लोकतांत्रिक आवाज़ का गला घोंटने और साम्प्रदायिक घृणा का प्रचार करने में सारी सीमाएं लांघ गए हैं. कारपोरेट मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इन कृत्यों को चंद हाशिए के सिरफिरे तत्वों का कारनामा बताकर सरकार की सहापराधिता पर पर्दा डालना चाहता है. क्या इन कृत्यों का औचित्य स्थापन करनेवाले सांसद और मंत्री हाशिए के तत्व हैं? लेकिन छिपाने की सारी कोशिशों के बाद भी बहुत साफ़ है कि इतनी वृहद योजना के साथ पूरे देश में, कश्मीर से कन्याकुमारी तक, असम से गुजरात तक निरंतर चल रहे इस भयावह घटनाचक्र के पीछे सिर्फ चन्द सिरफिरे हाशिए के तत्वों का हाथ नहीं, बल्कि एक दक्ष सांगठनिक मशीनरी और दीर्घकालीन योजना है. उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में १६ मई, २०१४ के बाद से सैकड़ों छोटे बड़े दंगे प्रायोजित किए जा चुके हैं. खान-पान, रहन-सहन, प्रेम और मैत्री की आज़ादी पर प्रतिबन्ध लगाए जा रहे हैं. गुलाम अली के संगीत का कार्यक्रम आयोजित करना या पाकिस्तान के पूर्व विदेशमंत्री की पुस्तक का लोकार्पण आयोजित कराना भी अब खतरों से खेलना जैसा हो गया है. त्योहारों पर खुशी की जगह अब खौफ होता है कि न जाने कब, कहाँ क्या हो जाए. भारत एक भयानक अंधे दौर से गुज़र रहा है. अभिव्यक्ति ही नहीं, बल्कि जीने का अधिकार भी अब सुरक्षित नहीं.

आज़ाद भारत में पहली बार एक साथ इतनी तादाद में लेखकों-लेखिकाओं और कलाकारों ने सम्मान, पुरस्कार लौटा कर और पदों से इस्तीफा देकर 'सत्य से सत्ता के युद्ध' में अपना पक्ष घोषित किया है. यह परिघटना ऐतिहासिक महत्त्व की है क्योंकि सम्मान वापस करनेवाले लेखक और कलाकार दिल्ली, केरल, कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तराखंड, बंगाल, कश्मीर आदि तमाम प्रान्तों के हैं. वे कश्मीरी, हिन्दी, उर्दू, मलयालम, मराठी, कन्नड़, अंग्रेज़ी, बांगला आदि तमाम भारतीय भाषाओं के लेखक-लेखिकाएं हैं. उनका प्रतिवाद अखिल भारतीय है. उन्होंने अपने प्रतिवाद से एक बार फिर साबित किया है कि सांस्कृतिक बहुलता और सामाजिक समता और सदभाव, तर्कशीलता और विवेकवाद भारतीय साहित्य का प्राणतत्व है. रूढ़िवाद और यथास्थितिवाद का विरोध इसका अंग है. इन मूल्यों पर हमला भारतीयता की धारणा पर हमला है. हमारी आखों के सामने अगर एक पैशाचिक विनाशलीला चल रही है, तो उसका प्रतिरोध भी आकार ले रहा है. हमारे लेखक और कलाकार जिन्होंने यह कदम उठाया है, सिर्फ इन मूल्यों को बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि भविष्य के भारत और भारत के भविष्य की लड़ाई को छेड़ रहे हैं.
आइये , उनका साथ दें और इस मुहिम को तेज़ करें.
राजेन्द्र कुमार, अध्यक्ष, जन संस्कृति मंच
प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच


कुमार अंबुज : हां ! पुरस्कार लौटाने में राजनीति है, लेकिन....

लेखकों द्वारा सम्मान या पुरस्कार वापस करने संबंधी कुछ सवाल भी सामने आए हैं। इस संदर्भ में कुछ बातें, एक पाठक, लेखक और नागरिक के रूप में, कहना उचित प्रतीत हो रहा हैः

1. पुरस्कार वापस करने संबंधी तकनीकी दिक्कतें हो सकती हैं, यानी प्रदाता संस्था उसे वापस कैसे लेगी, प्रावधान क्या हैं, राशि किस मद में जमा होगी, इत्यादि। उसका जो भी रास्ता हो, वह खोजा जाए लेकिन समझने में कोई संशय नहीं होना चाहिए कि यह एक प्रतिरोध और प्रतिवाद की कार्यवाही है। तमाम तकनीकी कारणों से भले ही यह प्रतीकात्मक रह जाये किंतु इसके संकेत साफ हैं। यह एक सुस्पष्ट घोषणा है कि हम सत्ता की ताकत और आतंक से व्‍यथित हैं। हम विचार, विवेक, बुद्धि के प्रति हिंसा के खिलाफ हैं। अभिव्यक्ति की असंदिग्ध स्वतंत्रता के पक्ष में हैं, सांप्रदायिकता और धार्मिक उन्माद की राजनीति के विरोध में हैं। लोकतांत्रिकता और बहुलतावाद को इस देश के लिए अनिवार्य मानते हैं। इसलिए सम्मान-पुरस्कार वापस किए जाने की यह मुहिम बिलकुल उचित है, इस समय की जरूरत है।

2. कहा जा रहा है कि सम्मान राशि को ब्याज सहित वापस किया जाना चाहिए। और उस यश को भी वापस करना चाहिए, जैसे प्रश्न उठाए गए हैं। लेखक को जो राशि सम्मान में दी गई थी वह किसी कर्ज के रूप में नहीं दी गई थी और न ही उसे ऋण की तरह लिया गया था। वह सम्मान में, सादर भेंट की गई थी। इसलिए उस पर ब्याज दिए जाने जैसी किसी बात का प्रश्न ही नहीं उठता। जब तक वह सम्मान लेखक ने अपने पास रखा, उसे ससम्मान रखा, उसके अधिकार की तरह रखा। वह उसकी प्रतिभा का रेखांकन और एक विशेष अर्थ में मूल्‍यांकन था। वह किसी की दया या उपकार नहीं था। यश तो लेखक का पहले से ही था बल्कि अकसर ही सम्मान और पुरस्कार भी लेखकों से ही यश और गरिमा प्राप्त करते रहे हैं। इसलिए इन छुद्र, अनावश्यक बातों का कोई अर्थ नहीं है।

3. यदि इन सम्मानों को वापस करना राजनीति है तो निश्चित ही उसका एक राजनीतिक अर्थ भी है। लेकिन यह राजनीति वंचितों, अल्पसंख्यकों के पक्ष में है। यह राजनीति इस देश के संविधान, प्रतिज्ञाओं, पंरपरा और बौद्धिकता के पक्ष में है। यह राजनीति इस देश के लोकतांत्रिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों के लिए है। राष्ट्रवाद के नाम पर देश को तोड़ने के खिलाफ है, इस देश में फासिज्म लाने के विरोध में है।

4. जो कह रहे हैं कि आपातकाल या 1984 के दंगों के समय ये सम्मान वापस क्यों नहीं किए गए, उन्हें याद रखना चाहिए कि तब देश में इस कदर दीर्घ वैचारिक तैयारी के साथ, इतने राजनैतिक समर्थन के साथ अल्पसंख्यकों और विचारकों की ‘सुविचारित हत्याएँ’ नहीं की गई थी। तब कहीं न कहीं यह भरोसा था कि चीजें दुरुस्त होंगी, अब यह भरोसा नहीं दिख रहा है। यह हिंसा अब राज्य द्वारा प्रायोजित और समर्थित है। पहले इस तरह की हिंसा का कोई दीर्घकालीन एजेण्डा नहीं था, अब वह एजेण्डा साफ नजर आ रहा है। पहले एक धर्म, एक विचार और एक संकीर्णता को थोपने की कोशिश नहीं थी, अब स्पष्ट है। जब विश्‍वास खंडित हो जाता है और जीवन के मूल आधारों, अधिकारों पर ही खतरा दिखता है तब इस तरह की कार्यवाही स्‍वत:स्‍फूर्त भी होने लगती है। लेखक एक संवेदनशील, प्रतिबद्ध और विचारवान वयक्ति होता है। उस बिरादरी के अनेक लोगों के ये कदम बताते हैं कि देश के सामने अब बड़ा सकंट है।

तो सामने फासिज्म का खतरा साकार है। एक साहित्यिक रुझान के व्यक्ति और नागरिक की तरह मैं इन सब लेखकों के साथ भावनात्मक रूप से ही नहीं, तार्किक रूप से खड़ा हूॅं। और इसके अधिक व्यापक होने की कामना करता हूँ।
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कुमार अंबुज

Monday, October 12, 2015

जबलपुर के मौसाजी पूर्वोत्तर से लौटे, दर्शकों ने कहा जैहिंद

नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा नई दिल्ली के द्वारा आयोजित पूर्वोत्तर राष्ट्रीय रंग उत्सव 2015 में हिस्सा लेकर लौट आए हैं। विवेचना थियेटर ग्रुप के नाटक ’मौसाजी जैहिन्द’ का मंचन चार राज्यों के चार शहरों में उद्घाटन के अवसर पर हुआ।

विवेचना का कलाकार दल हिमांशु राय, वसंत काशीकर व बांकेबिहारी ब्यौहार के नेतृत्व में दिल्ली गया और 27 सितंबर को हवाईयात्रा कर बागडोगरा होते हुए गंगटोक पंहुचा। सिक्किम की राजधानी गंगटोक एक सुरम्य शहर है जो पहाड़ों पर बसा है। गंगटोक के ’मनन भवन’ में विवेचना थियेटर ग्रुप के नाटक ’मौसाजी जैहिन्द’ का पहला मंचन 28 सितंबर को हुआ। गंगटोक में प्रारंभ हुए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली के पूर्वाेत्तर राष्ट्रीय रंग उत्सव 2015 का उद्घाटन सिक्किम के राज्यपाल महामहिम श्रीनिवास पाटिल व सिक्किम के संस्कृति मंत्री श्री गुरंग ने किया। मौसाजी जैहिन्द की भूरि भूरि प्रशंसा करते हुए राज्यपाल महोदय ने सभी कलाकारों को सम्मानित किया। इस अवसर पर एन एस डी सिक्किम के रंगमंडल के छात्र छात्राओं ने भी नाटक के बारे में विस्तार से चर्चा की। एन एस डी सिक्किम के प्रभारी श्री विपिन कुमार ने वसंत काशीकर के अभिनय व लेखन - निर्देशन के लिए तारीफ की।


सिक्किम के बाद विवेचना की टीम त्रिपुरा की राजधानी अगरतला पंहुची। अगरतला एक शांत और साफ सुथरा शहर है। अगरतला में रवीन्द्र भवन में नाटक का शो आयोजित किया गया। यहां भी नाट्य समारोह का उद्घाटन ’मौसाजी जैहिन्द’ से हुआ जिसमें अगरतला के मेयर, एन एस डी अगरतला के प्रभारी श्री विजय कुमार सिंह और त्रिपुरा के वरिष्ठ कलाकार शामिल हुए। नाटक के लिए बड़ी संख्या में दर्शक आए और नाटक को बहुत पसंद किया गया। नाट्य मंचन के दूसरे दिन वसंत काशीकर, हिमांशु राय बांकेबिहारी ब्यौहार व अनूप जोशी को एन एस डी अगरतला के प्रशिक्षण सेन्टर नजरूल कला केन्द्र में आमंत्रित किया गया जहां एन एस डी अगरतला के थियेटर इन एजुकेशन के छात्र छात्राओं ने ’मौसाजी जैहिन्द’ के निर्देशक वसंत काशीकर से बातचीत की और नाटक के बारे में सवाल किए। सभी छात्र छात्राएं नाटक से बहुत प्रभावित हुए।
अगरतला से नाट्य दल हवाई यात्रा कर गौहाटी पंहुचा जहां से बस द्वारा असम के शहर जोरहाट पंहुचा। जोरहाट में पूरे आसाम से एन एस डी के पूर्व छात्र छात्राएं एकत्रित हुए थे। यहां जोरहाट थियेटर नाम से एक कला संस्था पिछले 120 सालों से काम कर रही है। जोरहाट थियेटर का स्वयं का ऑडीटोरियम है जिसमें मंचन संपन्न हुआ। जोरहाट में नाट्यप्रेमियों से ऑडीटोरियम भरा हुआ था। समारोह का उद्घाटन जोरहाट के डी सी व एन एस डी के प्रोडक्शन कंट्रोलर श्री पराग शर्मा व असम के जाने माने अभिनेता श्री सैकिया ने किया। नाटक को बहुत पसंद किया गया और नाटक के अंत में सभी कलाकारों को सम्मानित किया गया। जोरहाट थियेटर के ऑडीटोरियम को बहुत कलात्मक तरीके से असम के कलाकारों ने सजाया था। 

जोरहाट, असम से विवेचना थियेटर ग्रुप की टीम मेघालय के शहर तूरा के लिए रवाना हुई। तूरा भी गंगटोक की तरह पूरी तरह पहाड़ियों में बसा है। यहां एक शानदार ऑडीटोरियम है। तूरा शिलांग के बाद दूसरा बड़ा शहर है। यहां के उत्सव का दायित्व पवित्र राहा और बेनथिंग की टीम ने सम्हाला हुआ था। यहां बड़ी संख्या में स्कूल कालेज के छात्र छात्राएं नाटक देखने आए। नाटक का मंचन बहुत सराहा गया। सभी कलाकारों का स्वागत मेघालय की परंपरा अनुसार किया गया।


चारों ही शहरों में बुंदेली हिन्दी नाटक ’मौसाजी जैहिन्द’ को समझने में कोई दिक्कत नहीं आई। कलाकारों ने इस यात्रा में चार पूर्वोत्तर राज्यों की चार अलग अलग संस्कृतियों का परिचय प्राप्त किया और इन राज्यों के कलाकारों से मित्रता हुई। विवेचना जबलपुर ने बुंदेलखंड की मधुर भाषा और लोकसंस्कृति व कथाकार उदयप्रकाश की कहानी को उत्तर पूर्व में पंहुचाया। कलाकार दल गौहाटी से दिल्ली हवाई यात्रा कर रेलयात्रा कर जबलपुर पंहुचा। नाट्य दल में वसंत काशीकर, श्रीमती शोभा उरकुडे, श्रिया श्रीवास्तव, अक्षय सिंह, चिन्टू स्वामी, सौरभ विश्वकर्मा, तरूण ठाकुर, आयुष राठौर, आशीष तिवारी, जतिन राठौर, शुभम जैन, अक्षय टेमले, रोहित सिंह, अनूप जोशी बंटी भोपाल नरेन्द्र सिंह भोपाल हिमांशु राय व बांकेबिहारी ब्यौहार शामिल थे।